…तो क्या एेसे सलामत रहेगी चोटी? लोग अपना रहे है कैसे कैसे टोटके

अपनी चोटी बचाने के लिए लेडीज ने परम्परागत उपाय अपनाए हुए हैं, लेकिन अब एक नए उपाय का सहारा लिया जा रहा है, जिससे चोटी कटवा पास नहीं फटके।
दरअसल, चोटी कटवा का आतंक राजस्थान के पश्चिमी क्षेत्र से होता हुआ दक्षिणी राजस्थान के उदयपुर में भी पहुंच गया है। उदयपुर जिले के मावली उपखण्ड में भी अब महिलाएं चोटी कटने के डर से सहमी हुई हैं। यहां के सबसे बड़े कस्बे फतह नगर में इसका असर महिलाओं के चेहरे पर साफ-साफ दिखाई दे रहा है। मावली और फतह नगर में महिलाएं नीम के पत्ते लेकर घर से बाहर निकल रही हैं, ताकि चोटी काटने वाला उनके पास भी नहीं फटके। इन महिलाओं का कहना है कि ये सब टोटके करने से काटने वाला उनके पास नहीं आ सकता।
स्थित यह बन गई हैं कि डरे हुए लोग चोटी कटनेवाली घटनाओं को भूत-प्रेत का साया बता रहे हैं। वहीं, कोई कह रहा है कि इसके पीछे शरारती तत्वों का हाथ हो सकता है। चोटी बचाने को यूं सिर ढककर निकली रही हैं महिलाएं दक्षिणी राजस्थान के कई इलाकों में स्थित गांवों में परम्परागत उपायों के तहत महिलाएं चोटी कटवा से बचने के लिए अपने घरों के बाहर कुमकुम और हल्दी के छापे लगा रही हैं, ताकि उनके घर में किसी भूत का प्रवेश ना हो और उनकी चोटी सलामत रहे। इन गांवों की महिलाओं का कहना है कि कोई ऐसी घटना नहीं घटे इस कारण वे अपने हाथ से तीन-तीन छापे हल्दी-कुमकुम के लगा रहीं हैं। साथ ही देखने में आया है कि महिलाएं अपनी चोटी को पन्नी से ढककर घरों से बाहर निकल रही है। इसके साथ ही लोग दरवाजे के बाहर मेंहदी भी लगा रहे हैं। गौरतलब है कि राजस्थान, उत्तरप्रदेश, दिल्ली और हरियाणा तक पहुंचा चोटी कटवा ने इन राज्यों में रहने वाली महिलाओं की चिंता बढ़ा दी है। स्थिति यह हो गई है कि यह अंधविश्वास का रूप आतंक बनता जा रहा है। उधर, इस तरह की घटनाओं के बारे में मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि कारण मॉस्ट हिस्टीरिया नाम की मानसिक समस्या है। इसके तहत एक स्‍थान विशेष में रहने वाला पूरा समूह किसी अफवाह पर भरोसा कर लेता है और उसे सच मानने लगता है। यहां तक कि लोग खुद भी इस तरह की हरकतें करने लगते हैं।
इससे पहले मुंह नोचवा की खबर फैली थी जिसे आजतक किसी ने नहीं देखा। अफवाह पर लोगों को इतना विश्वास हो गया था कि सोते वक्त उन्हें लगने लगा कि कोई उन्हें नोचकर भाग रहा है। वहीं 1980 के दशक में बच्चे उठाने वाली चुड़ैल ने भी पूरे उत्तर भारत में इसी प्रकार का आतंक मचाया था। तब भी लोग अपने घरों के मुख्य द्वार पर मेंहदी, हल्दी और कुमकुम से हाथ के छापे लगाकर बला से बचाव का प्रयास करने लगे थे।