होली पर पढ़िए ध्रुव गुप्त का आर्टिकल : फिर तुम्हारी याद आई ओ सनम !

सामाजिकता का चलन ख़त्म होने के साथ हमारी उम्र के लोगों के लिए होली अब स्मृतियों और पुराने फिल्मी गीतों में ही बची रह गई है। रंग तो अब गुज़रे ज़माने की बात है। शाम को पड़ोस से आकर किसी ने पैरों पर अबीर रखकर प्रणाम कर लिया तो कर लिया। अभी यूट्यूब पर मनपसंद पुराने होली गीत सुन रहा था कि बचपन की होलियों की याद आई। तब दिन में हम गांव के कुछ लड़के-लडकियां रंग-अबीर लेकर गांव…

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