मथुरा : सर्राफा व्यापारी से 5 करोड़ से अधिक की है हुई लूट, अभी तक सुराग नहीं

मथुरा के होली गेट क्षेत्र में दो सर्राफा व्‍यवसाइयों की हत्‍या करने वाले बदमाश करीब 5 करोड़ रुपए का सोना लूटकर ले गए हैं। यह जानकारी सर्राफा व्‍यवसाय से जुड़े सूत्रों ने दी है, हालांकि पीड़ित परिवारों ने अभी नुकसान का आंकलन नहीं किया है। गौरतलब है कि कोयला वाली गली में मयंक चेन के नाम से सर्राफा व्‍यवसाय करने वाले विकास अग्रवाल सिर्फ सोने का ही व्‍यवसाय करते थे और इसलिए उनके यहां सोने के ही दूसरे कारोबारियों का आवागमन रहता था। यही कारण था कि लूट के वक्‍त एक अन्‍य सर्राफा व्‍यवसाई 30 वर्षीय मेघ अग्रवाल भी व्‍यावसायिक कारोबार के संदर्भ में मयंक चेन पर मौजूद थे। सर्राफा कमेटी के सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार ढाई से तीन किलो सोना तो मेघ अग्रवाल ही अपने साथ मयंक चेन पर लेकर गए थे।
सर्राफा कमेटी ने इस जघन्‍य वारदात का खुलासा न होने तक सर्राफा बाजार पूरी तरह बंद करने का निर्णय लिया है और आगे की रणनीति के लिए आज शाम बैठक बुलाई है। मथुरा में किसी सर्राफा व्‍यवसाई के यहां होने वाली यह कोई पहली जघन्‍य वारदात नहीं है। इससे पहले भी बदमाश कई दुस्‍साहसिक वारदातों को अंजाम दे चुके हैं और कई सर्राफा व्‍यवसाई इसमें अपनी जान गंवा चुके हैं। पुलिस हर वारदात का अपने रटे-रटाए तरीके से खुलासा कर देती है किंतु वारदातें हैं कि रुकने का नाम नहीं लेतीं। ऐसे में यह सवाल खड़ा होना लाजिमी है कि जब पुलिस बदमाशों को पकड़ती है तो फिर वारदातों पर लगाम क्‍यों नहीं लगती ? इस सवाल के जवाब में ही छिपा है जघन्‍य अपराधों का पूरा कच्चा चिठ्ठा और यही जवाब बता सकता है कि सत्ता बदल जाने के बावजूद अपराधों का ग्राफ नीचे क्‍यों नहीं आता।
प्रथम तो सोने-चांदी का धंधा अधिकांशत: ”वायदा कारोबार” पर निर्भर है जिसमें लिखा-पढ़ी काफी कम होती है। सर्राफा कारोबार की इस सच्‍चाई से बदमाश भी भली-भांति वाकिफ हैं लिहाजा वह बेखौफ होकर वारदात को अंजाम देते हैं। उन्‍हें पता होता है कि पकड़े जाने पर भी उनके पास लूट का इतना माल बच जाएगा जिससे वह पुलिस को भी सेट कर सकते हैं और कानूनी लड़ाई भी लड़ सकते हैं।
नोटबंदी के बाद शहर के कृष्‍णा नगर क्षेत्र में हुई लूट की ऐसी ही एक वारदात को पीड़ित सर्राफ ने किस तरह नकार दिया और बदमाशों को लूट की रकम के साथ पकड़ने के बावजूद पुलिस की किस तरह छीछालेदर हुई, यह इसका एक उदाहरण है अन्‍यथा इससे पहले भी अनेक वारदातों में इसी प्रकार सच्‍चाई छिपाई जाती रही है। पुलिस को फिर वह पैसा आयकर विभाग में जमा कराना पड़ा।
दूसरे जब कोई बड़ी वारदात हो जाती है तो पुलिस पर उसे जल्‍द से जल्‍द खोलने का दबाव इतना अधिक रहता है कि वह असली अपराधियों तक पहुंच नहीं पाती और अपने यहां दर्ज आपराधिक रिकॉर्ड को खंगाल कर उन्‍हीं में से किसी को बलि का बकरा बना देती है ताकि एक ओर जहां पब्‍लिक का आक्रोश शांत कर वाहवाही लूटी जा सके वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दबाब से भी मुक्‍ति पाई जा सके।
सर्राफा व्‍यवसाइयों के यहां लूट की वारदातें लगातार होते रहने का तीसरा कारण उन व्‍यक्‍तियों का कभी गिरफ्त में न आ पाना है जो बदमाशों के लिए मुखबिरी का काम करते हैं और उसके एवज में लूट के माल का अच्‍छा खासा हिस्‍सा पाते हैं। कौन नहीं जानता कि कोई भी लूट की ऐसी वारदात तभी होती है जब बदमाशों को किसी से अपने शिकार की सटीक जानकारी मिलती है। बदमाशों को पता होता है कि जहां वह वारदात को अंजाम देने जा रहे हैं वहां उन्‍हें कितना माल मिल सकता है और उसमें से कितना माल नंबर दो यानि बिना लिखा-पढ़ी का होगा।
उधर पुलिस भी वारदात का जल्‍द से जल्‍द अनावरण करने के लिए जो मिलता है और जैसा मिलता है, उसी को आरोपी बनाकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर लेती है। ऐसे में उसके दोनों हाथ में लड्डू होते हैं।
सरकार योगी की हो अथवा किसी अन्‍य की, पुलिस वही है और पुलिस की कार्यप्रणाली भी वही है। सत्‍ता जरूर बदलती है किंतु बाकी कुछ नहीं बदलता। सत्‍ता पर काबिज होने वाले लोग पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों का सिर्फ तबादला करके या उन्‍हें ताश के पत्‍तों की तरह फैंटकर यह समझ लेते हैं कि व्‍यवस्‍था परिवर्तन हो जाएगा लेकिन ऐसा होता नहीं है। अधिकारी और कर्मचारियों की सूरतें बदलती अवश्‍य दिखाई देती हैं परंतु सीरत जस के तस रहती है। लगता है कि नेताओं से कहीं ज्‍यादा अच्‍छी तरह इस चूहे-बिल्‍ली के खेल को बदमाश समझते हैं और इसलिए वह ”बंदर” बनकर अपना उल्‍लू सीधा करते रहते हैं।
मयंक चेन पर हुई जघन्‍य वारदात को आज विधानसभा में भी उठाया गया और सरकार के प्रवक्‍ता, मथुरा शहर के विधायक और प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने भी एक कुशल राजनेता की तरह उसके शीघ्र अनावरण की बात कही। हो सकता है कि जल्‍द से जल्‍द वारदात का अनावरण कर भी दिया जाए लेकिन क्‍या इससे सर्राफा व्‍यवसाइयों के साथ हो रही वारदातों पर प्रभावी अंकुश लग पाएगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं। होगा भी नहीं, क्‍योंकि सत्‍ता बदलती हैं पर व्‍यवस्‍थाएं नहीं। चेहरे बदलते हैं किंतु कार्यप्रणाली नहीं। यहां तक कि मानसिकता भी नहीं बदलती। और जब सबकुछ वही रहता है तो कैसे संभव है कि लखनऊ की कुर्सी पर बैठने वाले एक अदद व्‍यक्‍ति के बदल जाने से व्‍यवस्‍थाओं में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाएगा।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का डिजिटिलाइजेशन किए जाने के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कहे गए ये शब्‍द बहुत मायने रखते हैं कि व्‍यवस्‍थाएं तब बदलती हैं जब उन्‍हें एप्‍लाई करने वालों का मन बदलता है। व्‍यवस्‍थाएं केवल तकनीक से नहीं बदल सकतीं। बहुत बड़ा है उत्‍तर प्रदेश, इसलिए कहीं न कहीं बदमाश इसी प्रकार व्‍यावसायिक, राजनीतिक और प्रशासनिक खामियों का लाभ उठाकर जघन्‍य वारदातों को अंजाम देते रहेंगे। कहीं न कहीं कोई मेघ अग्रवाल, कोई विकास मारे जाते रहेंगे। यूपी में सरकार जरूर बदली है किंतु सरकारी तंत्र का मन बदलता दिखाई नहीं दे रहा। और जब तक इस तंत्र का मन नहीं बदलेगा तब तक कुछ भी बदलने की उम्‍मीद भी करना, खुद को धोखे में रखने जैसा ही है।

-legend news