रिबन’ में है महत्वाकांक्षी शहरी युवाओं का संघर्ष

नई दिल्ली । महानगरीय जिंदगी की भाग-दौड़ और करियर के उतार-चढ़ाव को बयां करने वाली फिल्म ‘रिबन’ किसी भी शहरी मध्यवर्गीय युवा जोड़े की कहानी हो सकती है, जिसे फिल्म की निर्देशक राखी शांडिल्य ने बहुत ही सहजता व ईमानदारी से पर्दे पर उतारा है।

‘रिबन’ राखी की डेब्यू फिल्म है और उन्होंने एक ऐसे मुद्दे को अपनी पहली परियोजना के लिए चुना है, जो समाज के युवा वर्ग की कहानी को छूता है। लघुचित्र से फिल्म निर्देशन में उतरने वाली राखी कहती हैं कि उन्हें हमेशा से वास्तविक व समाज से निकलने वाली कहानियां बयां करना पसंद है, भले ही माध्यम डॉक्यूमेंट्री हो या फिल्म।

‘रिबन’ के बारे में राखी ने मुंबई से टेलीफोन पर आईएएनएस को बताया, “अपने सपनों को हकीकत बनाने में जी-जान से लगे महानगरीय एक जोड़े कल्कि (शहाना) व सुमित व्यास (करन) की जिंदगी में तब उथल-पुथल मच जाती है, जब उन्हें पता चलता है कि उनके घर एक अनचाहा मेहमान आने वाला है। इस खबर को सुन उनके मन में भी वही ख्याल आता है, जो वास्तव में इस तरह की स्थिति सामने आने पर करियर की चाह रखने वाले किसी भी जोड़े के मन में आता है, लेकिन करन, शहाना को इस बच्चे को जन्म देने के लिए मनाता है और उनका जीवन बच्चे की किलकारियों से गूंजने लगता है।”

उन्होंने आगे कहा, “बेटी के बड़ा होने पर शहाना जब दोबारा नौकरी की ओर रुख करती है तो उसे पता चलता है कि उसका करियर, पद, प्रतिष्ठा सब पीछे छूट चुका है। बच्ची की परवरिश, परिवार की जिम्मेदारियों व करियर के बीच शहाना और करन का जीवन तमाम परेशानियों से घिर जाता है। जिंदगी की इसी उथल-पुथल और जद्दोजहद की कहानी है रिबन।”

इस फिल्म का टाइटल ‘रिबन’ क्यों है? यह पूछे जाने पर राखी ने कहा, “मुझे लगता है कि हमारे संबंध रिबन की गांठ की तरह होते हैं, जो खुलते-बंधते रहते हैं। हमें इन्हें बहुत ही सहेज के रखना होता है।”

अपने सपनों को उड़ान देने में लगे एक युवा जोड़े के जीवन में बच्चे के आने से उथल-पुथल मच जाती है, जिससे कई विवाहित व अविवाहित शहरी युवा वर्ग को दो-चार होना पड़ता है। आपकी यह डेब्यू फिल्म है, इतने समसामयिक विषय को चुनने की कोई खास वजह?

जवाब में राखी ने कहा, “मुझे लोगों के सामने वास्तविक कहानियां पेश करना अच्छा लगता है। मैं डॉक्यूमेंट्री बनाती हूं और उसमें भी मैं ऐसे मुद्दे को बयां करती हूं, जो हमारे समाज व जिंदगी से ही निकलकर आते हैं। मुझे लगता है कि एक निर्माता के तौर पर अगर आप समाज के समक्ष समाज से ही जुड़े मुद्दे को रखते हैं, तो इससे उस विषय पर न केवल लोगों की मानसिकता में बदलाव आता है, बल्कि उसके प्रति भी लोग सोचने को मजबूर होते हैं।”

‘माइ बेबी नॉट माइन’, ‘हेरीटेज इंडिया’ और ‘देसी फोल्क’ जैसी डॉक्यूमेंट्री बना चुकीं हैं और इसी के साथ उन्होंने फिल्म निर्देशन में भी प्रवेश कर लिया है। डॉक्यूमेंट्री या फिल्म क्या अधिक पसंद है, इस पर राखी ने कहा, “मुझे वास्तविक कहानियों से बेहद लगाव है, इसलिए मेरा रुझान डॉक्यूमेंट्री की ओर अधिक है। इसलिए कि यहां आपको वास्तविक मुद्दे पर बात करने की पूरी स्वतंत्रता होती है। मैं हालांकि फिल्मों को भी पसंद करती हूं, जाहिर है कि यह एक बड़ा माध्यम है और इसकी पहुंच लोगों की बड़ी संख्या तक होती है।”

एक महिला व निर्देशक होने के तौर पर आपको क्या लगता है कि महिला प्रधान फिल्मों को बॉलीवुड में उतनी जगह मिल रही है, जितना उन्हें मिलना चाहिए? इस पर राखी कहती हैं, “जी नहीं। मुझे लगता है कि महिला प्रधान विषयों को उतनी जगह नहीं मिलती है, जितनी मिलनी चाहिए। मैं यहां कहना चाहूंगी कि समय बदला है और पिछले एक-दो साल में कई महिला प्रधान फिल्मों- ‘पिंक’, ‘पीकू’, ‘अनारकली ऑफ आरा’, ‘बेगम जान’ ने दर्शकों के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज की है, लेकिन मंजिल अभी काफी दूर है।”