नगालैंड में चौथी बार मुख्यमंत्री बन सकते हैं :नेफ्यू रियो

नई दिल्ली| तीन बार नगालैंड के मुख्यमंत्री रहे नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) के नेता नेफ्यू रियो अब चौथी बार इस कुर्सी के करीब पहुंच गए हैं। इस बीच, वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव जीतकर वे संसद में भी पहुंचे थे। लेकिन उन्होंने संसद सदस्यता के मुकाबले सीएम की कुर्सी को तवज्जो दी और अब उनको अपनी मंजिल पाने में कामयाबी मिल गई है। इस जीत के साथ ही उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) को सत्ता से बाहर की राह दिखा कर अपने निलंबन का बदला भी चुका लिया है। रियो ने वर्ष 2002 में एनपीएफ का गठन किया था। लेकिन उसी पार्टी ने बीते साल उनको निलंबित कर दिया था। रियो की महात्वाकांक्षा और उनकी कामयाब रणनीति को भांप कर ही भाजपा ने यहां उनकी पार्टी से हाथ मिलाने का फैसला किया था और इसके लिए महज एक-तिहाई यानी 20 सीटों पर ही लड़ने को राजी हो गई। 11 नवंबर, 1950 को राजधानी कोहिमा के पास तौफेमा गांव में पैदा होने वाले रियो राज्य की अंगामी जनजाति के हैं। यहां राजनीति में जातियों की काफी अहमियत है। कोहिमा के मिशनरी स्कूल में शुरुआती शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे पश्चिम बंगाल के पुरुलिया स्थिति सैनिक स्कूल में चले गए। उसके बाद दार्जिलिंरियो स्कूल व कालेज के दिनों में छात्र संघ में काफी सक्रिय रहे थे। बाद में उन्होंने काफी उम्र में ही सक्त्रिस्य राजनीति में कदम रखा। वर्ष 2003 में पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने से पहले वे स्थानीय निकायों में कई अहम पदों पर रहे। वर्ष 1993 में वे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य बने। वर्ष 1989 में वे कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर पहली बार उत्तरी अंगामी विधानसभा सीट से चुनाव जीते थे। उनको सरकार में खेल व स्कूली शिक्षा मंत्री बनाया गया।

अगली बार यानी वर्ष 1993 में भी उसी सीट से चुनाव जीत कर वे आवासन मंत्री बने थे। वर्ष 1993 का विधानसभा जीतने के बाद वे राज्य के गृह मंत्री बने। लेकिन 2003 के चुनावों से पहले सितंबर, 2002 में उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया और नवंबर में विधानसभा से कुछ दिनों बाद उन्होंने कांग्रेस से भी इस्तीफा दे दिया। नवंबर, 2002 में उन्होंने नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) का गठन किया और उसी के टिकट पर चुनाव लड़ कर जीते। उनको डेमोक्रेटिक एलायंस ऑफ नगालैंड (डीएएन) का नेता चुना गया। यह भाजपा समेत कई दलों का गठजोड़ था। रियो ने छह मार्च, 2003 को नगालैंड के मुख्यमंत्री के तौर पर कार्यभार संभाला। वे तीन जनवरी, 2008 तक ही इस कुर्सी पर रह सके। उस दिन राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था। कुछ महीने बाद हुए चुनाव में जीत कर वे दोबारा मुख्यमंत्री बने। बीते लोकसभा चुनावों में उनको एनपीएफ का उम्मीदवार बनाया गया और राज्य की इकलौती सीट से जीत कर संसद में पहुंचे। उनकी इच्छा केंद्र में मंत्री बनने की थी। लेकिन यह इच्छा पूरी नहीं होते देख कर उन्होंने एक बार फिर राज्य की राजनीति में लौटने का मन बनाया। लेकिन इस बीच, राज्य में सत्तारुढ़ एनपीएफ में सत्ता के कई केंद्र बन चुके थे।

यहां अपनी ओर से बनाई पार्टी में ही रियो हाशिए पर कर दिए गए। बाद में पार्टी-विरोधी गतिविधियों के आरोप में उनको पहले शो-काज नोटिस दिया गया और फिर पार्टी की सदस्यता से निलंबित कर दिया गया। उसके बाद विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले उन्होंने अपनी नई पार्टी बना कर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया। मौके की नजाकत और राज्य के जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने भी एनपीएफ से पंद्रह साल पुराने संबंध तोड़ कर रियो की पार्टी से हाथ मिलाने का फैसला किया। रियो के मुख्यमंत्री बनने की स्थिति में उनके सहयोगी होने के नाते भाजपा खुद ब खुद राज्य की साझा सरकार में शामिल हो जाएगीग के सेंट जोसेफ्स कालेज में भी पढ़े। उन्होंने कोहिमा आर्ट्स कालेज से बीए की डिग्री ली।