वो दिन दूर नहीं जब हम अपनी आंखों से देश का विनाश होते देखेंगे, कोरोना महामारी पर पढ़िए प्रियंका शर्मा एडवोकेट का यह आर्टिकल-

दुखद : आज हम फिर से एक बार और लॉकडाउन जैसे हालातों में पहुंच गए है, क्या हम फिर से इसके लिए तैयार है?? अगर है तो कितना ? यदि किसी को लगता है कि लॉकडाउन लगाने से कोरोना खत्म हो जाएगा तो जरा दिल्ली बॉर्डर, मुंबई से लाखों की संख्या में मजदूरों का पलायन देखना चाहिए, जिस तरह लॉकडाउन की घोषणा से और घोषणा से पहले से लाखों लोग मुंबई, दिल्ली व अन्य जगहों को छोड़ भाग रहे हैं, पिछली साल से इस बार कोरोना की लहर ज़्यादा ख़तरनाक है और ऐसे में लाखों की भीड़ धक्का मुक्की करती हुयी, बसों की एक सीट पर जबरजस्ती बैठे कई लोग, कितना संक्रमण फैल रहा होगा… सोचिए जरा… जबकि इतना तो सिर्फ़ मेरी कल्पना मात्र है, इससे सिहरन हो उठती है ।

आज कचहरियों में भी त्राहि माम मची है. वकील मित्रों / परिचितों को कोरोना निकल रहा है, मृत्यु हो रही है, कचहरी एक ऐसी जगह है जहां हज़ारों लोग रोज़ आते जाते हैं. सोसल डिसटेंसिंग वग़ैरह छोड़िए, मास्क तक नहीं लगाया होता है लोगों ने. हद तो यह है कि जब अंगूठा लगाते हैं तो उसी एक बेस पर सब अंगूठा लगा रहे होते है, ना कोई कलीनलिनेस ना ही वह जो थोड़ा करना भी चाहें उनके लिए सेनेटाइज़र तक न होता है जब कुछ कहो कि कोविड का समय चल रहा है और यहाँ सेनेटाइज़र तक नहीं तो उत्तर होता है कि – ई करोना वरोना कुछ नहीं होता है ।

सरकारों का एकमात्र दायित्व होना चहिए ऐसे में कोरोना पर नियंत्रण और बस केवल नियंत्रण । अधिक चिंतनीय बात तो यह है कि देश में ढेरों की मात्रा में कोरोना संक्रमित लोग, ढ़ेरों लाशें, दवाओं की कालाबाजारी, रोज़मर्रा की महंगी होती चीजें , स्वास्थ्य सेवाओं में लाचारी, शासन- प्रशासन की खामियां सिर चढ़कर बोल रही हैं, इतनी भयानक स्थिति खराब होने के बावजूद भी हमारे नीति नियंता जनता पर ध्यान देने के बजाय चुनावों में व्यस्त हैं।

वर्तमान परिस्थतियों में सरकार/ अदालत द्वारा लॉकडाउन लगाने की बात कही गई लेकिन लॉकडाउन समस्या का समाधान नहीं बल्कि और ज़्यादा समस्या खड़ी करना है, यदि खुद अब्जर्ब किया जाए तो पाएंगे कि अभी कई लोग पिछली बार के लॉकडाउन से उभर नहीं पाए है और अभी भी जूझ रहे हैं ऐसे में छोटे व्यापारी, दिहाड़ी मजदूर, रोज कमाने खाने वाले, फेरी वाले, इत्यादियों का चूल्हा नहीं जल पाता अगर ये दो दिन न कमाएं, माननीय न्यायालय को इन जैसे लोगों के लिए भी सरकार से कुछ व्यवस्था करा कर लॉकडाउन पर विचार करना चाहिए था।

लॉकडाउन जरुरी हैं लेकिन इन गरीब दिहाड़ी मजदूर वर्ग की भी अपनी जरूरतें हैं, लॉकडाउन तो खत्म हो जाता है फ़िर शूरु होता हैं कोरोना का नया रुप “भरोना” बिजली बिल, बच्चों की स्कूल फीस, घर खर्च, EMI, इत्यादि इत्यादि, सरकारों द्वारा मदद के नाम पर पर बस कागजी कार्यवाही मात्र होती हैं और ऐसे में रोज रोज लॉकडाउन लगा कर काम नहीं चलाया जा सकता ।

आज हालात इतने खराब है इतने तो विश्व युद्ध के दौरान भी नहीं रहे होंगे, होती मौतों के कारण शवदाह ग्रहों व कब्रिर्स्तानों में शवों के आने का सिलसिला थम नहीं रहा है अगर ऐसा ही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं, जब हम अपनी आंखों से देश का विनाश होते देखेंगे, इंसान ने अपनी ज़िन्दगी में क्या कमाया, ये उसकी अंतिम यात्रा में शामिल लोगों की संख्या से गणना से जान जाते थे लेकिन इस कोरोना महामारी ने इतना बेबस बना दिया है सबको कि चाह कर भी अपनो के अंतिम दर्शन दूभर है।

अंत में बस इतना ही कि हम सब अपनी जिम्मेदारी समझ औरो की जिंदगियों का भी खयाल कर एतिहात बरते व कोरोना से बचाव के नियमों का पालन करें और खुद को और अपने परिवार को कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाएँ। जय हिंद

  • लेखिका प्रियंका शर्मा एडवोकेट, आगरा से हैं