खाने नही खिलाने वाली क़ौम बनो, पढ़िए मुसलमानों को आईना दिखाता यह आलेख

अगर मुसलमानों ने वक़्त रहते राजनीतिक इफ़तार पार्टियों का बहिष्कार कर दिया होता तो योगी की यह कहने की जुर्रत न होती कि वो इफ़तार पार्टी नही देंगे, मुसलमानों को न सिर्फ़ किसी भी राजनीतिक इफ़तार पार्टी का बहिष्कार करना था बल्कि वजह भी बतानी थी कि इफ़तार सिर्फ़ हलाल की कमाई से किया जाता है और हम अपनी इबादतों का राजनीतिकरण नही चाहते  |

होना तो यह था कि मुसलमान ख़ुद इफ़तार के वक़्त ग़रीबों को खाना खिलाते, चाहे वो दूसरे मज़हब के ही क्यों न होते, लेकिन तुम अपने रोज़े की बरकतें गंवाने सरकारी दस्तरख़्वान पर चले गये, कुछ फ़ोटो खिंचवा लिये और उनके टोपी रूमाल पर रीझ कर न सिर्फ़ उन्हें वोट देते रहे बल्कि सवाल करने की हिम्मत भी न जुटा सके, उनकी चंद खजूरें जो खा चुके थे, मुसलमान तय करे कि उसे इफ़तार पार्टियां चाहिए या तालीम रोज़गार और हक़तलफ़ी पर सवाल करने की हिम्मत ?

यह ज़रूरी नही कि योगी ने इफ़तार नही कराया तो वो मुसलमानों की तालीम रोज़गार का इंतज़ाम कर देंगे लेकिन यह ज़रूर हुआ है कि जिन्होंने  इफ़तार पार्टियां दी उन्होने तालीम रोज़गार के लिए बिलकुल कुछ नही किया !
मुसलमानों खाने वाली नही खिलाने वाली क़ौम बनो, वही तुम्हारा असल कैरेक्टर है |  इफ़तार और वज़ीफ़े मे मत बहल जाओ, सवाल करो ? सवाल करो तालीम ओ रोज़गार के लिए ?  सवाल करो नाजायज़ मुक़दमात और फ़र्ज़ी एनकाउंटर पर, सवाल करो दंगो पर, दंगो मे होने वाली भेदभाव वाली कार्यवाही पर, सवाल करो मस्जिद के गिराये जाने पर और भीड़ के हुकुमत करने पर, इतना नही कर सकते तो रोना रोने से कोई फ़ायदा नही !
-नसीम पठान जौनपुरी के फेसबुक वाल से