‘कमल’नाथ अध्याय मध्यप्रदेश में खत्म, अब BJP कमल खिलाने को तैयार

इंसान की धड़कन या दिल में अगर कुछ हो जाता है तो उसका असर पूरे शरीर पर पड़ता है। ऐसा ही कुछ से देश की धड़कन मध्यप्रदेश में हो रहा है। मध्य प्रदेश में लगभग 2 सप्ताह से सियासी संकट कायम है। शुक्रवार को कमलनाथ के इस्तीफे के साथ ही प्रदेश में 15 महीने के कमल अध्याय का समापन हो गया और अब तैयारी कमल को खिलाने की शुरू हो गई है। हाथ का साथ छोड़ कमल के संग चलने का फैसला लेने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया इस सियासी उठापटक के केंद्र बिंदु में रहे हैं। कांग्रेस भी यही मानती है और भाजपा भी यही कहती है कि वह अपने घर को संभाल नहीं पाए तो हमें इसका जिम्मेदार क्यों ठहरा रहे हैं? कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि 15 वर्षों के बाद मध्यप्रदेश में जो कांग्रेस सत्ता में आई थी वह महज 15 महीने में ही लड़खड़ाकर गिर गई। प्रदेश की कमान संभालने वाले कमलनाथ ने कोशिश तो बहुत की पर कामयाबी नहीं मिल पाई। एक अच्छे प्रबंधक के रूप में नाम कमा चुके कमलनाथ अपने समय में अपनी यह प्रबंधन क्षमता सिद्ध नहीं कर पाए। उनकी अपनी ही पार्टी के विधायक उनसे बाकी हो गए। मनाने की कोशिशें तो तमाम हुई पर बात बन नहीं पाई।

ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के लगभग 22 विधायकों ने कमलनाथ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यह विधायक सीधे-सीधे ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थन में खड़े हो गए। हालांकि प्रदेश में यह पहला मौका नहीं है जब पार्टी आंतरिक गुटबाजी से परेशान हो रही है। यह हमेशा माना जाता है कि मध्य प्रदेश में वर्तमान की राजनीति में कांग्रेस 3 गुटों में बैठी हुई थी। एक गुट 10 वर्षों तक शासन में रहने वाले दिग्विजय सिंह का है, दूसरा गुट पर कमलनाथ का और तीसरा ज्योतिरादित्य सिंधिया का। 2018 में जीतने के बाद कांग्रेस ने कमलनाथ को प्रदेश की जिम्मेवारी सौंपी। सिंधिया को उम्मीद थी कि शायद प्रदेश में उन्हें कुछ अहम भूमिका मिलेगी। समय बीतता गया पर सिंधिया के मन मुताबिक उन्हें कुछ नहीं मिला। समय-समय पर सिंधिया और कमलनाथ के बीच टकराव की भी खबरें आती रहीं। सिंधिया समर्थक मंत्री और विधायक भी कमलनाथ को चेताते रहे कि अगर सिंधिया की नहीं सुनी जाएगी तो इसका अंजाम बुरा हो सकता है और हुआ भी वही। कमलनाथ के शासन में आते ही दिग्विजय सिंह का ग्राफ बढ़ता गया और सिंधिया का ग्राफ घटता गया। अपनी परंपरागत सीट गुना से लोकसभा का चुनाव हारने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया राज्य की राजनीति से अपनी ही पार्टी के द्वारा किनारे किए जाने लगे।

पार्टी आलाकमान से शिकायत के बावजूद भी सिंधिया मध्य प्रदेश की राजनीति में लगातार पिछड़ते जा रहे थे। इसके अलावा ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की जनता भी यह लगने लगी थी कि कमलनाथ के सत्ता में आने से यह क्षेत्र खुद के साथ सौतेला व्यवहार का सामना कर रहा है और विकास कार्य की परियोजनाओं में छिंदवाड़ा और उसके आसपास के क्षेत्रों का ज्यादा प्रभाव रह रहा है। सिंधिया के बगावती तेवर उस दिन सबके सामने आ गया था जब सिंधिया ने खुलेआम यह कह दिया था कि अगर राज्य सरकार जनता से किए वायदे को पूरा नहीं करेगी तो मैं सड़क पर उतरुंगा। इसके जवाब में कमलनाथ ने सीधा सीधा यह कह दिया कि जो उतरना चाहता है उतर जाये। इसके बाद से सिंधिया और कमलनाथ के बीच तकरार बढ़ गई और मार्च के पहले सप्ताह से मध्य प्रदेश में सियासी संकट शुरू हो गया। सिंधिया समर्थक विधायक बेंगलुरु जा पहुंच जाते हैं। वहां एक होटल में ठहरते हैं और यह संदेश भेजते हैं कि हम ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ है और अगर हमारी बात नहीं मानी जाती तो हम सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेंगे। उसके बाद विधायकों ने अपना इस्तीफा भेज दिया। कांग्रेस लगातार यह कहती रही कि यह बीजेपी कर रही है। बीजेपी ने प्रदेश में हॉर्स ट्रेडिंग के जरिए विधायकों को खरीदने की कोशिश कर रही है। यह विधायक जब बेंगलुरु पहुंचते हैं और मीडिया में खबर आने लगती है तो हर तरफ एक हलचल सी रहती है। लेकिन इस हलचल के बीच सबसे खामोश रहते हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया। आखिरकार रंगो के त्यौहार होली के दिन ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा आलाकमान से मुलाकात करते हैं। वह प्रधानमंत्री से मिलते हैं, अमित शाह से मिलते हैं, जेपी नड्डा से मिलते हैं और बाद में भाजपा में शामिल हो जाते हैं। उधर बेंगलुरु में बैठे बागी विधायक कमलनाथ के साथ जाने को तैयार नहीं थे। वे अपने विधायकी से इस्तीफा देने पर अड़े थे और कांग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए वे लगातार कह रहे थे कि हम यहां स्वतंत्र हैं, अपने मर्जी से आए हैं और हम पर किसी भी तरह का कोई भी दबाव नहीं है।

इन सबके बीच दिग्विजय सिंह आरोप लगाते रहे कि यह सब भाजपा का किया कराया है। हालांकि इन 15 महीनों में भाजपा भी समय समय पर कमलनाथ को कहती रहती थी कि यह सरकार अपने ही अंतर कलह से गिर जाएगी। कभी गोपाल भार्गव जो कि नेता प्रतिपक्ष है वह यह कह देते थे कि हमें तो नंबर एक और नंबर दो के निर्देश का इंतजार है, हम तो कमलनाथ सरकार को 2 मिनट में गिरा दे। तो कभी कैलाश विजयवर्गीय भी सरकार गिराने की धमकी देते रहते थे। लगभग 8 दिनों तक कांग्रेस ने विधायकों को मनाने की कोशिश की। कांग्रेस के बड़े नेता बेंगलुरु पहुंचे लेकिन बागी विधायक उनसे मिलने को तैयार नहीं हुए। राज्यपाल ने कमलनाथ को फ्लोर टेस्ट पास करने को कहा लेकिन यह नहीं किया गया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने कमलनाथ से फ्लोर टेस्ट पास करने को कहा। आगे का रास्ता बंद देखते हुए पहले विधायकों का इस्तीफा स्वीकार किया जाता है उसके बाद खुद कमलनाथ एक प्रेस वार्ता करने के बाद राज्यपाल से मिलकर अपना इस्तीफा सौंप देते हैं। इसके साथ ही कमलनाथ के सरकार का मध्यप्रदेश में अंत हो जाता है।

लेकिन अब बारी भाजपा के लिए सत्ता की सवारी की है। आंकड़ों की बात करें तो वह भी भाजपा के पक्ष में ही है। मंगलवार को भाजपा विधायक दल की बैठक है जिसमें यह निर्णय लिया जाएगा कि आखिर सत्ता की कमान किसे सौंपी जाए। फिलहाल मुख्यमंत्री पद की रेस में कौन सबसे आगे है, इस पर कुछ कह पाना फिलहाल मुश्किल है। भले ही हम यह कह सकते हैं कि शिवराज सिंह चौहान के नाम पर किसी को एतराज नहीं होगा लेकिन सवाल अभी भी कायम है कि क्या शिवराज सिंह चौहान को पार्टी आलाकमान एक बार फिर से मौका देगी? अगर पार्टी को शिवराज को मौका देना ही है तो उनके नाम का घोषणा करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए थी लेकिन पार्टी की तरफ से ना सूत्र यह स्पष्ट कर रहे हैं और ना ही कोई प्रवक्ता इस बारे में बोलने को तैयार हो रहा है। मुख्यमंत्री पद की रेस में नरोत्तम मिश्र, नरेंद्र सिंह तोमर, गोपाल भार्गव, राकेश सिंह जैसे नेता भी शामिल है। लेकिन मुख्यमंत्री कौन बनेगा इसका फैसला तो आलाकमान को ही करना होगा।