#BoycottBollywood एक प्रोपेगेंडा के सिवा कुछ नहीं, फ़िल्में अच्छी होंगी तो लोग खुद देखने आयेंगे- ज्योति मदनानी सिंह

आजकल देश में एक नया ट्रेंड है | जिसको भी देखो बॉलीवुड को मनोरंजन की तरह लेने की बजाय दिल पर ले रहा है | आये दिन तमाम नए नए संगठन किसी भी फिल्म की रिलीज से पहले ही हंगामा करते हैं और नए ट्रेंड चलाते हैं | बॉलीवुड के बायकाट का एक नया चलन चल गया है | इन सभी पर फ़िल्म इंडस्ट्री में मशहूर कास्टूम डिज़ाइनर ज्योति मदनानी सिंह से हमारे संवाददाता ने बात की | पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश-

सवाल- #BoycottBollywood या ‘टार्गेट बॉलीवुड’ के संदर्भ में आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
ज्योति- ‘सोशल मीडिया’ एक ऐसा प्लेटफॉर्म जहाँ हर किसी को अपना विचार व्यक्त करने की पूरी छूट है, और हर कोई यहाँ अपनी बात रख कर रातों-रात प्रचलित होना चाहता है। मेरी समझ से, अब तुरंत प्रचलित होने के लिये किसी बहुप्रचलित विषय टीका-टिपण्णी की आवश्यकता होती है। अब अगर आप कुछ पॉज़िटिव लिखेंगे या कहेंगे तो आपकी बातें कोई नहीं सुनता, लेकिन अगर आप किसी बड़ी चीज़ या हस्ती की बुराई करेंगे तो लोगों की नज़रों में आप या आपकी बातों तुरंत आती हैं। मेरी समझ से, #BoycottBollywood का जन्म ऐसे ही विचार वाले लोगों ने किया है। इनमें से बहुताधिक का बॉलीवुड से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन अपने कुनबे में और ज़्यादा प्रचलित होने के लिए इन लोगों ने बॉलीवुड को टार्गेट किया। इनमें बहुत से लोग ‘राइट विंग’ विचारधारा वाले हैं, जो वर्तमान समय में खुद के लिए ऐसी ज़मीन तलाश रहे हैं जो इनके भविष्य को सुखमय बना सके। ये लोग एक योजनाबद्ध और संगठित तरीक़े से सोशल मीडिया का ग़लत इस्तेमाल कर भारत की भूमि से और विदेशों से अपने प्रोपेगेंडा को हवा दे रहे हैं।

सवाल- क्या #Boycottbollywood से बॉलीवुड की छवि या व्यवसाय पर असर पड़ा है?
ज्योति : असर तो बिल्कुल पड़ा है। ‘सुशांत सिंह राजपूत’ की मृत्यु के बाद जो बॉलीवुड के प्रति एक नकारतमकता (negativity) का दौर शुरू हुआ था, उस आग में इन लोगों ने घी डालने का काम किया है। इसमें कोई दो राय नहीं की ‘सुशांत सिंह राजपूत’ की मौत के बाद, बॉलीवुड की चकाचौंध भरी ज़िंदगी के पीछे बहुत सारा अंधकारमय सच्चाई से वाबस्ता होने के बाद आम लोगों के अंदर ग़ुस्से का ग़ुबार है जो उन्हें बॉलीवुड और बॉलीवुड वसियों को नीची निगाह से देखने को मजबूर करता है। अच्छे-बुरे लोग तो हर क्षेत्र में होते है, हिंदी सिनेमा के प्रशंसक ये स्वीकार नहीं कर पाये। इन प्रोपेगेंडा वालों ने अपने फ़ायदे के लिए प्रशंसकों के ग़ुस्से के लावा को फटने और उसका असर दिखाने के लिए मजबूर किया है। लेकिन मेरा मानना है कि अगर अच्छी फ़िल्में बनेंगी तो अवश्य चलेंगी। अच्छी फ़िल्में दर्शकों के लिये वो मिठास भरी बूटी है जो स्वतः उन्हें चुम्बक की तरह सिनेमा हॉल में खींच लायेंगी। हाँ, लेकिन लॉकडाउन और कोरोना आपदा के बाद अच्छी फ़िल्मों की परिभाषा थोड़ी बदल गयी है।

सवाल- “अच्छी फ़िल्मों की परिभाषा बदल गयी है,” से आपका अभिप्राय क्या है ?
ज्योति- कोरोना काल के पूर्व, स्टार सिस्टम का बहुत ज़ोर था। ‘मल्टी स्टार कास्ट मसाला कमर्शल’ फ़िल्मों को ही अच्छी फ़िल्में माना जाता था। लोग पिकनिक की तरह फ़िल्म देखने जाते थे और मौज-मस्ती-खाना-पीने करके सपरिवार फ़िल्म देख छुट्टियाँ बिताते थे। लेकिन कोरोना काल में, ओटीटी की वजह से लोगों को बहुत सारी फ़िल्में देखने का विकल्प मिल गया। ओटीटी पर लोगों ने ना सिर्फ़ अंग्रेज़ी फ़िल्में देखीं बल्कि देश-विदेश के विभन्न भाषाओं में एक से एक बेहतरीन फ़िल्में देखीं। इस दौरान हिंदी भाषियों ने दक्षिण भारत की भाषाओं में एक से बढ़कर एक फ़िल्में देखीं, जिनमें हर मायने में विविधता थी जो सालों से रहीं हैं लेकिन उनके सामने उतनी नहीं आती थीं। एक और बात, कुछ सालों पहले तक हिंदी फ़िल्मों के गाने बड़े अच्छे होते थे, जो की रिलीज़ से पहले सुनने को मिलते थे। वो लोगों को थिएटर तक खींच कर लाते थे। लेकिन आज वो कर्णप्रिय गीत-संगीत विलुप्त होते जा रहे हैं। कुल मिलाकर, जनता के पास हिंदी फ़िल्में देखने के लिये इन्वाइट दमदार नहीं है, और इसकी तुलना में उनके पास चुनने के लिए बहुत वैराइटी है।

सवाल- आने वाले समय को आप कैसा देखती हैं?
ज्योति- हर आज, एक नये कल की रूपरेखा निर्धारित करता है। फ़िल्म इंडस्ट्री में काम करने वाला हर कोई विचलित है। हर कोई चाहता है की लोग सिनेमा घरों में ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में आयें और फ़िल्में देखें। क्यूँकि अगर लोग फ़िल्में नहीं देखेंगे, तो हम कमाये-खाएँगे क्या! लोगों के लिए ये मनोरंजन का साधन है, लेकिन हमारे लिए तो ये रोज़ी-रोटी है। मेरी जानकारी में, फ़िल्म इंडस्ट्री ने अपने कार्य-प्रणाली में बदलाव लाना शुरू कर दिया स्टार अपनी फ़ीस कम कर रहे हैं ताकि बजट संतुलन में रहे, निर्माता नयी कहानियों के साथ एक्सपेरिमेंट के लिए राज़ी हैं, ग़ैर फ़िल्मी लोगों के साथ भेद-भाव में कमी हो रही है, सिनमा हॉल के टिकट की दरों में भी कमी पर सभी पार्टी विचार कर रहे हैं, फिर लोगों के मन से कोरोना का डर सम्भवतः निकल चुका है वो भी आने वाले समय में ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में सिनमा हॉल का रुख़ करेंगे ऐसी अपेक्षा है। कुल मिलाकर बहुत सारे अच्छे बदलाव हो रहे हैं, जिससे की हिंदी सिनमा को उसकी पहले जैसी छवि प्राप्त हो सके और विश्वस्तर पर उसकी पहचान बरकरार रहे।

विशेष- (ज्योति मदनानी सिंह, फ़िल्म इंडस्ट्री में बतौर कास्टूम डिज़ाइनर काम करती हैं। ज्योति ने हिंदी फ़िल्मों के अलावा मलयालम और सिंहल भाषा की फ़िल्मों के लिये भी वेशभूषा डिज़ाइन किया है। पाठक ज्योति से ट्विटर (@jyotimadnani) और इंस्टाग्राम (@jyoti.madnani.singh) पर सम्पर्क कर सकते हैं)