जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए ! पढ़िए पितृपक्ष पर ध्रुव गुप्त का यह आर्टिकल

हिन्दुओं के पितृपक्ष का आरम्भ हो चुका है। पितृपक्ष यानी दुनियादारी के कामों से थोड़ी सी फ़ुर्सत निकाल कर अपने पूर्वजों और दिवंगत प्रिय लोगों को याद करने का अवसर। धर्म और अध्यात्म कहते हैं कि मृत्यु के बाद वीतरागी आत्माएं संसार से मुक्त होकर ब्रह्मांडीय ऊर्जा या ईश्वर में समाहित हो जाती हैं। पृथ्वी के विगत बंधनों से साथ उनका कोई सरोकार नहीं रहता। हमारी चिंता यह है कि राग-विराग, मोह-माया, दुख-सुख और हज़ारों ख्वाहिशों में जकड़े लोग मरने के बाद कहां जाते होंगे ? कमबख्त मुंह को लगी यह दुनिया तो छूटने से रही। शायद वे प्रेत बनकर अपनी काम्य वस्तुओं और प्रिय लोगों के इर्द-गिर्द भटकते हुए अगले जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियों की तलाश करते हैं। पितृपक्ष के कर्मकांड का आयोजन उन्हीं भटकती आत्माओं की शांति के लिए है। इन आयोजनों का एक विपक्ष भी है जो कहता है कि मृत्यु के बाद हमारी इच्छाओं, अतृप्तियों, विचारों और संस्कारों से निर्मित हमारी सूक्ष्म देह को मुक्ति के लिए श्राद्ध में अर्पित की जाने वाली सम्पति, भोजन, कपड़ों, बिस्तर की ज़रुरत नहीं होती। आत्माओं के न शरीर होते हैं, न इन्द्रियां। न उन्हें स्वर्ग के सुखों की कोई दरकार है और न उनकी सूक्ष्म देह को नरक की आग में जलाया जा सकता है।

विज्ञानं का मानना है कि मृत्यु के बाद सब कुछ ख़त्म हो जाता है। विश्वास और अविश्वास के बीच झूलते हमारे जैसे लोग कर्मकांडों में तो भरोसा नहीं करते, लेकिन मन में यह बात बहुत गहरे तक बैठी है कि हमारे पूर्वजों की समय और स्थान से परे किसी न किसी आयाम में उपस्थिति है और वे विगत रिश्तों के साथ एक बंधन में ज़रूर बंधे हैं। उन्हें यह देखकर ख़ुशी ज़रूर मिलती होगी कि पिछले जीवन के उनके अपने अब भी शिद्दत और सम्मान से उन्हें याद करते हैं।

पितृपक्ष में अपने और संसार की तमाम पितरों को नमन और श्रद्धा निवेदन !

-लेखक ध्रुव गुप्त पूर्व आईपीएस हैं |