रोहिंग्या मुसलमानों की मदद कर मानवता की मिसाल पेश करें सभी देश, पढ़िए अमन शर्मा का यह आर्टिकल

म्यांमार का अरकान ( रखाइन) प्रान्त बांग्लादेश की सीमा से सटा हुआ है, इसी प्रान्त में रोहिंग्या मुस्लिम सब से ज्यादा हैं | वैसे तो म्यांमार का कोई कानूनी धर्म नहीं है लेकिन फिर भी ये देश बौध्द धर्म को तबज्जो देता है और यहां की सरकार में चीन का हस्तक्षेप भी काफी ज्यादा रहता है। रोहिंग्या मुसलमानों की बर्मा में अजीबो गरीब स्थिति है. उन्हें न तो बर्मा अपना रहा है न ही पड़ोसी देश बांग्लादेश | म्यांमार में समुद्री दुर्घटनाए सामान्य बात है क्योंकि वहा के लोग नाव परिवहन पर निर्भर हैं। म्यांमार से रोहिंग्या मुस्लिम भगाये क्यों गए? म्यांमार के मुस्लिम जेहादियों ने म्यांमार सुरक्षाबलों की चौकियों पर आतंकी हमला कर दिया था जिसके परिणाम स्वरूप म्यांमार सुरक्षा बलों ने रोहिंग्या मुस्लिमों को निशाने पर लिया। पाखंड में अंधे होकर रोहिंग्या मुस्लिमों ने आतंक का रास्ता अपनाया जिसकी वजह से शांतिपूर्ण अहिंसक बौद्ध अनुयायियों वाले देश में भी विरोध उत्पन्न हुआ। अपने विरोध का जताने के लिए मुस्लिमों ने अलग अलग देशों में भी कई हिंसक प्रदर्शन किए, भारत में बोध-गया में बम विस्फोट किया गया।

अमर जवान ज्योति क्षतिग्रस्त की गई, कई हिंसक झड़पें हुई स्थानीय पुलिस के साथ।जिसके फलस्वरूप अंतरराष्ट्रीय दबाब म्यांमार पर आ गया और उसने और अधिक सख्ती से रोहिंग्या मुस्लिमों के विरोध को दबाना शुरू कर दिया और ज्यादा से ज्यादा रोहिंग्या मुस्लिमों ने बॉर्डर पार कर के बांग्लादेश और भारत में अवैध रूप से घुसना शुरू कर दिया।
सवाल ये है कि वो कौन से राज्य थे,वो कौन सी राजनैतिक पार्टियां थी जो इतने बड़े पैमाने पर हो रही घुसपैठ पर अपनी सहमति दे रही थीं ?उन राज्यों से जहां या तो कम्युनिस्ट सरकारें थी या फिर वो जो मुस्लिम तुष्टिकरण में पूर्णतः यकीन रखती थी। वसुधैवकुटुंबकम का नारा देते देते कई मुल्कों के कुटुंब बन गए। क्या आपने सुना है कि भारत का कोई राष्ट्रप्रमुख या विदेशमंत्री शरणार्थियों का स्वागत कर रहा हो ?दुनिया भर में आप्रवासियों के ख़िलाफ हो रही राजनीति का विरोध कर रहा हो ? केरल, पंजाब,गुजरात तो आप्रवासी भारतीयों के उत्पादक राज्य हैं। भारत ने 1950 मे तिब्बती शरणार्थियों को अपनाया, 1971-72 में बंगलादेशी शरणार्थियों को अपनाया तो रोहिंग्या मुसलमानों को क्यों वापस भेजा जा रहा है?

भूतकाल में जो निर्णय लिया गया ज़रूरी नहीं वो सही ही हो, तिब्बत शरणार्थियों के भारत में आना पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू की अदूरदर्शिता का परिणाम था क्यों कि सरदार पटेल तो तिब्बत को भारत में पहले से ही मिलाना चाहते थे तब ऐसी किसी समस्या की सम्भावना ही न रहती। यूएन रिपोर्ट के मुताबिक विश्व में सबसे ज़्यादा ज़ुल्म रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रहा है। रोहिंग्या मुसलमानों बड़ी तादात में बच्चे,बुजुर्ग एवं महिलाए भी  है| इस हिंसा को रोकने के लिए सभी देश मिलकर रोहिंग्या मुसलमानों के लिए चन्दा लेकर उनके रहने का इंतज़ाम कर मानवता की मिसाल पेश करे। ऑस्ट्रेलिया ने रोहिंग्या मुसलमानों को एक द्वीप पर उनको शरण दी कुछ इस तरह का समाधान निकाला जा सकता है |

– युवा लेखक अमन शर्मा जयपुर से हैं |