TN शेषन कहते थे- ‘मैं नाश्ते में राजनेताओं को खाता हूं’, पढ़िए उनसे जुड़े ये अनसुने किस्से-

नई दिल्ली | मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन के बारे में उस वक्त कहा जाता था कि देश के नेता केवल दो चीजों से डरते हैं, पहला भगवान और दूसरा शेषन। ऐसा जलवा था उनका चुनाव आयुक्त के तौर पर। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि आई ईट पॉलिटीशियंस फॉर ब्रेकफास्ट यानी मैं नाश्ते में राजनीतिज्ञों को खाता हूं।

लेकिन शेषन का मानवीय पक्ष भी था। वो कर्नाटक संगीत के शौकीन थे। उनको इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स जमा करने का शौक था। शेषन की जीवनी लिखने वाले गोविंदन कुट्टी बताते हैं कि वे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स इस्तेमाल करने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ देखने के लिए खरीदते थे। उनके पास चार टेलिविजन सेट्स थे और उनकी हर दूसरी मेज या अलमारी पर एक स्टीरियो रिकॉर्डर रखा रहता था। उनका फाउंटेन पेन का संग्रह तो नायाब था।

चुनावी खर्च पर लगाम लगाने का भी श्रेय-
चुनावों में उम्मीदवारों के खर्च पर लगाम लगाने की बात हो या फिर सरकार से किराये पर लिए गए हेलिकॉप्टर के जरिए मंत्रियों के चुनाव प्रचार करने की नीति पर रोक। ये चीजें किसी नियम के तरह स्थिर नजर आती हैं तो इसका श्रेय शेषन को जाता है। दीवारों पर नारे लिखना और पोस्टर चिपकाना, लाउडस्पीकरों से कानफोड़ृू शोर करना, चुनाव प्रचार के नाम पर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने वाले भाषण देना सबकुछ उनके निशाने पर रहा और सरकार को ऐसे सवालों पर नए सिरे से सोचने पर मजबूर होना पड़ा।

एक और दिलचस्प बात भी उनके बारे में कहा जाता कि जो भी बच्चा उनके घर आता था, उसे वे अक्सर एक पेन भेंट में देते थे, जब कि वो खुद बेहद साधारण बॉलपेन से लिखते थे। वो एक बहुत मामूली घड़ी पहनते थे, वो भी सिर्फ व्यस्क होने के प्रतीक के तौर पर, जब कि उनकी अलमारी में दुनिया की एक से एक मंहगी घड़ियाँ पड़ी रहती थीं। चीजे जमा करना उनका शौक था, उनका इस्तेमाल करना नहीं।

हर बड़े शख्स से पंगा-
शेषन ने अपने कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से लेकर हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल गुलशेर अहमद और बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव में से किसी को नहीं बख्शा। उन्होंने बिहार में पहली बार चार चरणों में चुनाव करवाया और चारों बार चुनाव की तारीखें बदली गईं। ये बिहार के इतिहास का सबसे लंबा चुनाव था।

शेषन एक बार अमेरिका गए तो सहयोगी चुनाव आयुक्तों के बजाय उप आयुक्त डीएस बग्गा को कार्यभार सौंप गए। गिल कहते हैं वह शेषन से बात कर लेते थे, क्योंकि शेषन उनकी इज्जत करते थे। गिल भी उनसे अपने सीनियर की तरह ही व्यवहार करते थे, हालांकि उन्होंने कहा कि बग्गा को कार्यभार सौंपना कतई उचित नहीं था |