कोरोना से मौत पर दारुल उलूम ने दिया ये बड़ा फतवा-

लखनऊ । दारुल उलूम फरंगी महल के दारुल इफ्ता ने गुरुवार को फतवा जारी कर कोरोना की वजह से मरने वाले मुसलमानों को कब्रिस्तान में दफनाने का विरोध करने को शरीयत के खिलाफ  बताया है। फतवे में कहा गया है कि कोरोना से मरने वाले मुसलमानों को कब्रिस्तान में ही सुपुर्द-ए-खाक किया जाए। 

बुधवार को कोरोना से मरने वाले बुजुर्ग को कब्रिस्तान में दफनाने का विरोध होने के बाद राजधानी के सैयद अयाज अहमद ने इस्लामिक सेंटर ऑफ  इंडिया स्थित दारुल उलूम फरंगी महल के दारुल इफ्ता में सवाल पूछे थे कि क्या कोरोना से मरने वालों को इस्लामी तरीके से गुस्ल (नहलाना) नहीं दिया जाएगा। 

क्या उसे कफन भी नहीं पहनाया जाएगा। क्या उसकी जनाजे की नमाज नहीं पढ़ी जाएगी। क्या उसे कब्रिस्तान में दफन नहीं किया जाएगा। इस्लामी शरीयत की रोशनी में इसका जवाब दें।  इसके बाद दारुल इफ्ता फरंगी महल की तरफ  से मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली, मौलाना नसरुल्लाह, मौलाना नईमउर्रहमान सिद्दीकी और मौलाना मोहम्मद मुश्ताक के हस्ताक्षर से जारी फतवे में कहा गया है कि कोरोना मरीज का अगर देहांत हो जाता है तो उसे गुस्ल दिया जाएगा। 

इसका तरीका ये है कि सील बंद शव के ऊपर पानी बहा दिया जाए। इसे ही गुस्ल माना जाएगा। मौलाना ने कहा कि शव पर लगी सील खोलने की जरूरत नहीं है। इसी तरह शव को अलग से कफन पहनाने की भी जरूरत नहीं है। 

जिस प्लास्टिक में शव सील है उसे ही कफन माना जाएगा। मौलाना ने ये भी कहा कि मय्यत की जनाजे की नमाज भी पढ़ी जाएगी, ये एक फर्ज है। उन्होंने कहा कि शव को कब्रिस्तान में ही दफनाया जाएगा। मौलाना ने कहा कि इसका विरोध करना शरीयत के खिलाफ  है।  जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, वो कौम और मजहब को बदनाम कर रहे हैं। मौलाना ने कहा कि कोरोना से मरने वाले अछूत नहीं हैं, उनका पूरी इज्जत और धार्मिक रीतियों के मुताबिक अंतिम संस्कार किया जाए।