देश में एक ही काम है, लोग मर जाएँ लेकिन मोदी जी की छवि चमकती रहे, अपनी आंखें खोलने के लिए पढ़िए रवीश कुमार का यह आर्टिकल-

आज तक के एंकर रोहित सरदाना के निधन की ख़बर से स्तब्ध हूँ। कभी मिला नहीं लेकिन टीवी पर देख कर ही अंदाज़ा होता रहा कि शारीरिक रुप से फ़िट नौजवान हैं। मैं अभी भी सोच रहा हूँ कि इतने फ़िट इंसान के साथ ऐसी स्थिति क्यों आई। या इतनी तादाद में क्यों लोग अस्पताल पहुँच रहे हैं? क्या लोग अपने लक्षण को नहीं समझ पा रहे है, समझा पा रहे हैं या डाक्टरों की सलाह को पूरी तरह…

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कोरोना महामारी पर पढ़िए DIO संदीप कुमार का आर्टिकल- ‘हम जीत जाएंगे, बशर्ते हमारा खुद पर विश्वास बना रहे’

कोरोना संक्रमण के संकट से निपटने के लिए जो सबसे सरल उपाय है वह स्वयं परअधिकाधिक काम करना। हम में से प्रत्येक को स्वयं को सुरक्षित रखने का प्रयास करना है। ठीक वैसे ही जैसे हवाई जहाज में हवा का दबाव कम होने पर सबसे पहले स्वयं को ऑक्सीजन मास्क लगाकर सुरक्षित रहने की सलाह दी जाती है। वैसा ही इस समय भी करना है, क्योंकि हमारी स्वयं की सुरक्षा ही अप्रत्यक्ष रूप से हमारे प्रियजन और परिजनों की…

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वो दिन दूर नहीं जब हम अपनी आंखों से देश का विनाश होते देखेंगे, कोरोना महामारी पर पढ़िए प्रियंका शर्मा एडवोकेट का यह आर्टिकल-

दुखद : आज हम फिर से एक बार और लॉकडाउन जैसे हालातों में पहुंच गए है, क्या हम फिर से इसके लिए तैयार है?? अगर है तो कितना ? यदि किसी को लगता है कि लॉकडाउन लगाने से कोरोना खत्म हो जाएगा तो जरा दिल्ली बॉर्डर, मुंबई से लाखों की संख्या में मजदूरों का पलायन देखना चाहिए, जिस तरह लॉकडाउन की घोषणा से और घोषणा से पहले से लाखों लोग मुंबई, दिल्ली व अन्य जगहों को छोड़ भाग रहे…

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पढ़िए पूर्व IPS ध्रुव गुप्त का आर्टिकल- 76 साल का अकेलापन !

साइबेरिया में घने जंगलों में एक इलाका है जिसके 150 किमी के दायरे में कोई इंसानी आबादी नहीं है। सर्दियों में वहां का तापमान – 50 डिग्री तक गिर जाता है। क्या ऐसे दुर्गम और कठिन इलाके में कोई व्यक्ति अकेला भी रह सकता है ? हाल में ऐसी ही एक औरत 76-वर्षीय अगफाया लाइकोवा का पता लगा है। 1936 में स्टालिन के धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए रूस के कई परिवार यहां आकर बस गए थे। हालात…

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क्यो संदेश दिया जाता है कि मुस्लिमों का कोई खेवनहार है तो वह सिर्फ ओवैसी ही है ? आंखें खोल देगा वसीम अकरम त्यागी का यह आर्टिकल-

ग्रेटर हैदराबाद म्यूनिसिपल काॅर्पोरेशन (GHMC) के चुनाव में भाजपा ने अपने स्टार नेता प्रचार में उतारे हुए हैं। दिलचस्प यह है कि जीएचएमसी में BJP ने पिछली बार सिर्फ चार सीट ही जीती थीं, जबकि TRS ने 99 और AIMIM ने 44 सीट जीतीं थीं। लेकिन इस बार भाजपा एंव मीडिया का गठजोड़ इस चुनाव को AIMIM बनाम भाजपा बना रहा है, जानते हो क्यो ? यहां से अब मीडिया और भाजपा की सियासत को समझिए। भाजपा चाहती है…

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प्रत्येक नागरिक को जरूर पढ़ना चाहिए ध्रुव गुप्त का यह आर्टिकल- इंदिरा जैसा कोई नहीं !

देश की राजनीति में पहली बार पुरूष वर्चस्व को चुनौती, निजी बैंकों और कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण, राजाओं के प्रिवी पर्स की समाप्ति, चीन के मुखर विरोध के बावजूद सिक्किम का भारतीय गणराज्य में विलय, पाकिस्तान के टुकड़े कर एक नए देश बांग्लादेश का निर्माण, भारतीय सेना के आगे लगभग एक लाख पाकिस्तानी सैनिकों का ऐतिहासिक आत्मसमर्पण, कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण रोकने के लिए पाकिस्तान के साथ अपनी शर्तों पर शिमला समझौता, विश्व भर के विरोध और प्रतिबंधों की…

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पढ़िए ध्रुव गुप्त का यह आर्टिकल- राफेल की गर्जना सुनकर पाकिस्तान थर-थर कांपने लगा है..

मीडिया वाला राफेल ! ध्रुव गुप्त- फ्रांस से पांच राफेल आ गए। उनकी गड़गड़ाहट पर भारत के ज्यादातर न्यूज चैनल लहालोट हैं। उन्हें पता है कि राफेल की गर्जना सुनकर पाकिस्तान थर-थर कांपने लगा है। इमरान और बाजवा छिपने के सुरक्षित ठिकाने की खोज में हैं। जिनपिंग अपना देश छोड़कर कहीं और भाग जाएगा। राफेल के बारे में जितना भारतीय न्यूज एंकरों को पता है उतना शायद राफेल के निर्माताओं को भी नहीं है। वे एंकर जल्दी ही दुनिया…

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अमजद खान की पुण्यतिथि पर पढ़िए ध्रुव गुप्त का आर्टिकल- एक था गब्बर !

ध्रुव गुप्त- कोई अभिनेता किसी एक फिल्म से भी अमरत्व हासिल कर सकता है, हिंदी सिनेमा में इसका सबसे बड़ा उदाहरण मरहूम अभिनेता अमजद खान हैं। वैसे तो अमजद ने दर्जनों फिल्मों में खलनायक, सहनायक, चरित्र अभिनेता की विविध भूमिकाएं की, लेकिन याद उन्हें उनकी पहली फिल्म ‘शोले’ में गब्बर सिंह की भूमिका के लिए ही किया जाता है। हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने किसी डाकू का इतना खूंखार, भयावह और नृशंस चरित्र न पहले देखा था और न…

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पढ़िए गोपालदास नीरज की पुण्यतिथि पर ध्रुव गुप्त का आर्टिकल- ऐ भाई, ज़रा देख के चलो !

स्व. गोपाल दास नीरज जी को उनके छंदबद्ध गीतों के लिए ही जाना जाता है, लेकिन विचित्र तथ्य यह भी है कि हिंदी सिनेमा में छंदमुक्त गीतों के प्रवर्तक भी वही थे। वह पहला छंदमुक्त गीत था राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ का। राज जी को सर्कस के विदूषक की अपनी भूमिका में गाने के लिए कोई एक गीत चाहिए था जिसमें रफ़्तार भी हो, उदासी भी और जीवन-दर्शन भी। गीत की रचना के लिए बैठक जमी…

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पढ़िए विकास दुबे एनकाउंटर पर ध्रुव गुप्त का आर्टिकल- ख़ुश SP-BSP और BJP के असंख्य छोटे-बड़े नेता और जयचंद पुलिसकर्मी भी होंगे जिन्हें…

अंततः विकास दुबे कानपुर वाला कानपुर में पुलिस के हाथों मारा गया। अब इस विवादास्पद एनकाउंटर पर जमकर राजनीति भी होगी और चौतरफ़ा मुकदमेबाजी भी। हां, इतना ज़रूर है कि इस मुठभेड़ से दुबे के हाथों मारे गए सभी आठ पुलिसकर्मियों के स्वजनों-परिजनों को थोड़ी-बहुत शांति मिली होगी। खुशी उन लोगों को भी होगी जिन्होंने दुबे के तीन दशकों के आपराधिक जीवन में किसी न किसी रूप में यातनाएं झेली हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस प्रसन्न होगी कि इस मुठभेड़…

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