BSP सुप्रीमो मायावती ने इस सीट पर हारे हुए प्रत्याशी पर लगाया दांव, ये हैं समीकरण-

लखनऊ। प्रदेश में विधानसभा उपचुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। सत्तारूढ़ दल बीजेपी को छोड़कर विपक्ष की पार्टियां क्रमवार अलग-अलग सीटों पर अपने-अपने उम्मीदवारों की सार्वजनिक घोषणा कर रही हैं। वैसे तो कई सीटों पर विधानसभा उपचुनाव होने हैं, लेकिन केंद्रबिंदु में राजधानी की लखनऊ कैंट सीट है।

यह सीट तब खाली हुई जब डॉ. रीता बहुगुणा जोशी ने इस बार का लोकसभा चुनाव लड़ा और बीजेपी का प्रतिनिधित्व करने के लिए नई दिल्ली के संसद भवन तक पहुंची। वैसे चुनावी जीत-हार के नजरिये से लखनऊ कैंट विधानसभा क्षेत्र के ऐतिहासिक तथ्यों को खंगाले तो मुख्यत: राजनीतिक लड़ाई कांग्रेस और बीजेपी के ही बीच रही। हालांकि इसी बीच एक-एक बार के लिए निर्दलीय, भारतीय क्रान्ति दल और जनता पार्टी के उम्मीदवारों ने जीत की बाजी मार ली। अभी तक इस सीट पर उपचुनाव उम्मीदवार के रूप में केवल बसपा ने ही अपने एक नेता को उतारने का ऐलान किया है।

मगर पार्टी जानकारों की मानें तो वर्तमान राजनीतिक उठापटक के दौर में बसपा ने लखनऊ कैंट सीट पर एक तरह से हारे हुए प्रत्याशी पर जीत का दांव लगाने का जोखिम उठाया है। उनकी मानें तो बसपा प्रत्याशी अरूण द्विवेदी भले ही लखनऊ कैंट सीट पर जातिगत समीकरण के खांचे में कुछ हद तक हाथी को चुनावी हथियार बना सकते हैं, मगर बतौर एक जन या क्षेत्रीय नेता उनका यहां की जनता के बीच कोई खास पकड़ नहीं है।

बता दें कि इससे पहले भी अरूण द्विवेदी 2012 के विधानसभा चुनाव में लखनऊ उत्तर क्षेत्र से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे और चौथे स्थान पर आते हुए महज 13.50 फीसद वोट ही हासिल कर पाये थे। यही नहीं द्विवेदी लखनऊ मेयर का भी चुनाव एक बार लड़ चुके हैं जिसमें उन्हें पराजय का सामना ही करना पड़ा। इस सीट पर 2017 के विस चुनाव में बसपा उम्मीदवार ने केवल 0.38 फीसद वोट, 2012 के चुनाव में 17.80 फीसद वोट और 2007 के चुनाव में थोड़ा बेहतर 25 फीसद से अधिक वोट हासिल किया था। कुल मिलाकर लखनऊ कैंट सीट पर बसपा कभी भी मेन लड़ाई में नहीं रही और इसके प्रत्याशी हर बार तीसरे या चौथे स्थान पर चंद फीसद वोट हासिल कर अपनी क्षणिक उपस्थिति चुनावी मैदान में महसूस कराते रहें।