ओह, कैलाश ! पढ़िए केंद्र सरकार को आईना दिखाता ध्रुव गुप्त का यह आर्टिकल

चीन द्वारा सिक्किम में नाथूला सीमा पर कैलाश मानसरोवर के यात्रियों को रोकने की घटना विस्तारवादी चीन की दबंग कूटनीति का हिस्सा है। इसे उसकी भावनात्मक ब्लैकमेलिंग भी कहा जा सकता है जिसके माध्यम से वह सिक्किम और भूटान के क्षेत्र से गुजरने वाली अपनी निर्माणाधीन सड़क पर भारत के विरोध को कमज़ोर करना चाहता है। सिक्किम ही क्यों, भारत की आज़ादी के बाद चीन उत्तराखंड, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के भी कई हिस्सों पर अपना दावा ठोकता रहा है। अपने दावों के समर्थन में उसके पास एतिहासिक और सांस्कृतिक दस्तावेज़ भी हैं।

यह सही है कि भारत और चीन के बीच सीमाओं का निर्धारण कभी हो ही नहीं पाया। वहां सब कुछ कामचलाऊ ही है। चीन की दबंगई की वज़ह से बातचीत और सीमाओं के निर्धारण की कई कोशिशें नाकाम हो चुकी है। लेकिन सच यह भी है कि सीमाओं की अस्पष्टता की हालत में भारत के तमाम क्षेत्रों पर दस्तावेजों के आधार पर आज तक चीन ही दावा करता रहा है। भारत की भूमिका इस मसले पर हमेशा रक्षात्मक ही रही है। भारत चाहता तो चीन को वार्ता के टेबुल पर लाने के लिए ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक साक्ष्यों के आधार पर चीन के कुछ भाग पर दावा कर सकता था। कैलाश मानसरोवर उनमें से एक है। यह क्षेत्र हज़ारों वर्षों से भारतीय संस्कृति का केंद्र और हिन्दुओं के देवता भगवान शिव, देवी पार्वती, गणेश और कार्तिकेय का आवास रहा है। धार्मिक, सांस्कृतिक या ऐतिहासिक आधार पर चीन का इस क्षेत्र पर कोई दावा नहीं बनता। वैसे तो प्राचीन काल से समूचा तिब्बत ही चीन के बजाय भारतीय संस्कृति के ज्यादा निकट रहा है। अपनी भीरुता के कारण भारत ने इसपर दलाई लामा की निर्वासित सरकार की जगह चीन की प्रभुता स्वीकार कर ली थी।

क्या आपको नहीं लगता कि चीन की आक्रामक सीमा-नीति को देखते हुए हमें भी कम से कम कैलाश मानसरोवर पर साक्ष्यों के आधार पर थोड़ी आक्रामकता दिखानी चाहिए ?

-ध्रुव गुप्त के फेसबुक वॉल से साभार