उन्हें भी याद करें जो देश चलाते हैं, पढ़िए जस्टिस भगवती को समर्पित विधि छात्र अभिषेक का यह आर्टिकल

अभिषेक भटट्, देहरादून | बीते हफ्ते भारत जैसे महान देश का एक महान सूपत अपनी रोती-बिलखती माँ को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ कर चला गया। हम किसकी बात कर रहें हैं ? क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं ? बीते हफ्ते देश के 17वें मुख्य न्यायाधीश और भारतीय विधि जगत के सबसे बड़े प्रकाश स्तंभां में से एक प्रफुल्ल चंद नटवरलाल भगवती का निधन हो गया। 96 साल कीउम्र में उन्होंने अपनी आखिरी साँस ली। जस्टिस भगवती जी को याद किया जाना क्यों जरूरी है। वो भी ऐसे समय में जब ‘इसरो’ धडा़धड़ अंतरिक्ष में भारत का परचम लहरा रहा है और भारतीय किक्रेट टीम अपने पडा़ेसी देश पाकिस्तान के टी0वी व्यवसाय को गहरा नुकसान पहुँचाने पर लगी है।
भारत की जनता की आम चर्चा में उच्चतम  न्यायालय  का काफी कम ही जिक्र होता है। आम आदमी को अपने क्षेत्रीय विधायक,प्रधानमंत्री और राजनीति जैसे मामलों की गहरी समझ होती है परन्तु कोई आम आदमी देश के उच्चतम न्यायालय के बारे में बहुत कम जानता है। पी0 एन भगवती वो पहले मुख्य न्यायाधीश थे जिनके द्वारा दिए गये फैसलों ने देश की जनता को उच्चतम न्यायालय के साथ जोडा़। जस्टिस कृष्णा अय्यर के साथ मिलकर भारत में जनहित याचिका जिसे हम पी0आई0एल के नाम से जानते हैं,उसको लाने का श्रेय उन्हें जाता है।उनके समय में दिए गये कई महत्वपूर्ण  फैसलों ने भारत के आर्थिक-सामाजिक विकास में बहुत बडा़ योगदान दिया है। ऐसे आदमी को क्यों याद नहीं किया जाना चाहिए ?
सड़क पर चलते आम आदमी से अगर पूछा जाए कि सरकार का मतलब क्या होता है तो उसका जवाब होता है- प्रधानमंत्री और उसका मंत्रीमंडल। थोडा़ ज्यादा पढा़-लिखा व्यक्ति इसमें संसद या विधानसभा को जोड़ देगा। परन्तु आम आदमी को यह बिल्कुल भी नहीं पता है कि उच्चतम न्यायालय सरकार का एक अभिन्न अंग है। आज किसी आम आदमी को अमिताभ बच्चन का पूरा इतिहास पता है परन्तु शायद ही किसी को वर्तमान में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का नाम पता होगा। इसकी सबसे बडी़ वजह यह है कि कानून को समझना आम आदमी के बस की बाहर की चीज है और वह इससे दूर ही रहना चाहता है। दूसरा कारण है मीडिया का कानूनी मामलों को कोई बहुत ज्यादा पब्लिसिटी नहीं देना। तो कोई क्यों जस्टिस भगवती जैसे लोगों को याद करेगा।
भारत के विधि जगत में जस्टिस भगवती और उनके द्वारा दिए गये फैसलों का बहुत महत्वूपर्ण प्रभाव है, परन्तु भारत के विधि का इतिहास में दो केस ऐसे हैं जिनकी जानकारी आम आदमी को होनी ही चाहिए।  पहला केस है – मेनका गाँधी बनाम भारत संघ (1978) जिसमें फैसला देते हुए जस्टिस भगवती ने यह साफ किया कि संविधान के अनुच्छेद-21 मेंप्रदत्त मूल अधिकार का मतलब जानवरों की तरह जीवन जीना नहीं है परन्तु इस अधिकार में वे सारी चीजें शामिल हैं जो एक सम्मानित और अच्छा जीवन जीने के लिए जरूरी हैं। दूसरा केस – एम0सी मेहता बनाम भारत संघ( 1987) में जस्टिस भगवती ने भारत में ‘पूर्ण दायित्व’ के सिद्धांत प्रतिपादित किया और सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले मेंअंग्रेजों के समय से चले आ रहे कानून को भारतीय परिस्थियों के लिए अरूचिकर बताया। इस केस  में कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यावसायिक प्रतिष्ठान किसी गतिविधि में लिप्त है या लाभ कमाने के लिए कोई ऐसा  व्यवसायिक कार्य करता है जिसमें अगर कोई दुर्घटना हो जाए तो पास-पडो़स में जान-माल होना निश्चित, उन लोगों को जो ऐसी दुर्घटना से प्रभावित होगें, मुआवजा और अन्य राहत देने के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है और यह कोई बहाना नहीं होगा और कानून इस बात पर कोई ध्यान नहीं देगा कि उक्त व्यवसायिक प्रतिष्ठान ने उक्त दुर्घटना से बचने के पूरे इंतजाम कर रखे थे,या दुर्घटना भूल वश हुई है या यह दैव प्रदत्त आपदा है। इन दो केसों में जस्टिस भगवती द्वारा दिए गये फैसलों का महत्व सिर्फ कोई कानून का जानकार ही अच्छी तरह से समझ सकता है परन्तु एक आम आदमी की बात की जाए तो इन दो फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने सड़क पर चलते उस आम आदमी को वो सबकुछ दे दिया है जो भारत का संविधान उसे प्रदान करता है। इन दोनों ही फैसलों में जस्टिस भगवती के बहुमूल्य योगदान को आज का आम आदमी तो शायद नहीं करे परन्तु आज से  100-200 सालों बाद आने वाला आदमी जरूर समझेगा ।
यह वास्तव में बहुत राहत और फख्र की बात है कि भ्रष्ट नेताआें और भ्रष्ट नौकरशाही के बीच आज भी भारत के उच्चतम न्यायालय ने अपनी गरिमा को कभी कलंकित नहीं होने दिया है। उच्चतम न्यायालय ने हमेशा ऐसे फैसले दिए हैं जिन्होंने हमेशा भारत के आमआदमी के अधिकारों की रक्षा की है। ऐसा सिर्फ पी0एन भगवती जैसे महान जजों के योगदान के द्वारा ही हो पाया है।
ये बहुत दुःख की बात है कि आज के माँ-बाप अपने बच्चों को इंजीनियर,डॉक्टर आदि बनने की सलाह देते हैं। हर साल जब आई0ए0एस परीक्षाओं के परिणाम आते हैं तो न्यूज चैनलों में जमकर कवरेज होती है परन्तु शायद ही हमने  किसी न्यूज चैनल पर किसी जज का साक्षत्कार देखा हो। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया कभी ऐसी चीजों को नहीं दिखाता जो देश की युवा पीढी़ को कानून के क्षेत्र में जाने को प्रोत्साहित करे। मीडिया के पास दिनभर योगी आदित्यनाथ सीएम बनने तक का सफर दिखाने का समय और चाहत है परन्तु शायद ही ऐसी चाहत कभी सुप्रीम कोर्ट के जजों, जो देश के भविष्य को दिशा देते हैं, के जीवन के बारे में कभी लोगों और विशेषकर छात्रों को उत्साहित करने का बिल्कुल भी समय नहीं है।
– लेखक विधि के छात्र हैं  |