प्रत्येक व्यक्ति को पढ़ना चाहिए ध्रुव गुप्त का यह आर्टिकल- औरत का दिन !

इसमें कोई संदेह नहीं कि पुरुषों के साथ समानता के संघर्ष में स्त्रियों ने बहुत लंबा रास्ता तय किया है। वे अब मानसिक मजबूती, वैचारिक दृढता के साथ आर्थिक स्वतंत्रता भी हासिल करने लगी हैं। लेकिन यह लड़ाई अभी अधूरी है। स्त्रियों की असमानता की जड़ें पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता के अलावा उनकी बेपनाह भावुकता में भी है। सदियों से पुरुष सत्ता उनकी इस भावुकता से खेलती रही है। झूठी तारीफें कर हजारों सालों तक दुनिया के तमाम धर्मों और संस्कृतियों ने योजनाबद्ध तरीके से उनकी मानसिक कंडीशनिंग की हैं। उन्हें क्षमा, त्याग, करुणा, प्रेम, सहनशीलता और ममता की प्रतिमूर्ति बताकर। पुरुषों के साथ उनकी बराबरी की बात कोई नहीं करता। या तो वे देवी हैं या मज़े की चीज़। अगर स्त्रियां धर्मों की नज़र में इतनी ही ख़ास थीं तो यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि किसी भी धर्म में तमाम अवतार, धर्मगुरु, पैगंबर और नीतिकार पुरूष ही क्यों हैं ? क्यों पुरूष ही आजतक तय करते रहे हैं कि स्त्रियां कैसे जिएं ? उन्होंने तो यहां तक तय कर रखा है कि मरने के बाद स्वर्ग या जन्नत में जाकर भी अप्सरा या हूरों के रूप में उन्हें पुरूषों का दिल ही बहलाना है। हमारे नीतिशास्त्र स्त्रियों के व्यक्तित्व और स्वतंत्र सोच को नष्ट करने के पुरुष-निर्मित औज़ार हैं जिन्हें अपनी गरिमा मानकर स्त्रियों ने स्वीकार ही नहीं किया, सदियों से स्त्रीत्व की उपलब्धि बताकर आने वाली पीढ़ियों को हस्तांतरित भी करती आई हैं।

अब दुनिया की आधी, श्रेष्ठतर आबादी को अपनी भावुकता से मुक्त होकर यथार्थ की जमीन परखनी होगी। उन्हें महिमामंडन की नहीं, स्त्री-सुलभ शालीनता के साथ स्वतंत्र सोच, स्वतंत्र व्यक्तित्व और थोड़ी आक्रामकता की ज़रुरत है। स्त्री का जीवन कैसा हो, इसे स्त्री के सिवा किसी और को तय करने का अधिकार नहीं है।

सभी महिला मित्रों को महिला दिवस की अग्रिम शुभकामनाएं !

-लेखक ध्रुव गुप्त देश के वरिष्ठ साहित्यकार और पूर्व आईपीएस हैं ।