विश्व शांति पर मडरा रहे खतरे के बादल, पढ़िए अंकिता चौहान का यह आर्टिकल

अंकिता चौहान/ नई दिल्ली –
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से विश्व एक शांति के दौर से गुज़र रहा है। शीतयुद्ध मैं भी हिंसा के दुःखद परिणामो को ध्यान में रखते हुए किसी राष्ट्र ने कोई हिंसा या युद्ध के संकेत नही दिए थे। जैसे जैसे राष्ट्रों की सरकारों को मानवीय जीवन के महत्व का ज्ञान हुआ व समस्त मानवीय प्रजाति के प्रतिसंवर्दनशीलता का विकास हुआ वैसे वैसे एक दूसरे पर हिंसक गतिविधियों के विचारों का त्याग होने लगा। लेकिन तीन दशक बाद धीरे धीरे राष्ट्रों के बीच दबी हुई चिंगारी दिखाई देने लगी है। बुधवार को उत्तरी कोरिया ने अपनी नई बैलेस्टिक मिसाइल का प्रक्षेपण किया जो बड़े परमाणु बम ले जाने में समर्थ है उत्तरी कोरिया इससे पहले भी कई मिसाइलों व परमाणु बमो का परीक्षण कर चुका है पर वह सीधे तौर पर किसी राष्ट्र के क्षेत्र में जाकर नही गिरा ,उत्तरी कोरिया द्वारा इस मिसाइल का परीक्षण करते समय यह 950 किलोमीटर का सफर तय करते हुए जापान के विशेष उद्योगिक क्षेत्र मे जाकर गिरी ।

जिसको लेकर जापान, दक्षिणी कोरिया,अमेरिका ने सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाने का आग्रह किया है ,संयुक्त राज्य अमेरिका ने कोरिया के अस्तित्व समाप्त करने की धमकी देकर विश्व को फिर एक डर के साए में ला खड़ा किया है। उत्तरी कोरिया के यह कदम सभी राष्ट्रों के लिए चिंता का विषय बन गया है।उत्तरी कोरिया के परमाणु हथियार सम्पन्न राष्ट्रों में शामिल होकर आसपास के राष्ट्रों के खिलफ़ कार्यवाही करना व अमेरिका जैसी महाशक्ति को जगाना ये सभी विश्व शांति को भंग करने वाली कार्यवाही मानी जा रही है। सम्पूर्ण विश्व ने हथियार के हिंसक युद्ध को नकारते हुए आर्थिक,सामाजिक प्रतिस्पर्धा का रास्ता चुना है वैश्विकरन को मंच बनाकर अपनी क्षमता व शक्ति का प्रदर्शन करना ही अपना वर्चस्व स्थापित करने का एकमात्र साधन खोज गया है ।परमाणु युद्ध के कुपरिणामो ने ही धुर विरोधी राष्ट्रों को साथ आने पर विवश कर दिया था ।वर्तमान समय में विश्व के सभी देश युद्ध को टालने की कोशिश करते हुए एक सकारात्मक सोच तक पहुंचे है जहां से सहयोग का ही एकमात्र रास्ते खुलता है ।

ऐसे में उत्तरी कोरिया का निर्दयी रवैया विश्व शांति पर अंधकार की भांति छा रहा है। संयुक्त राज्य अमरीका का उत्तरी कोरिया को मिटा देने वाला बयान, उत्तरी कोरिया के भड़काने वाली गतिविधियों व बयानों का परिणाम है। इसका कारण वहां लोकतंत्र के अभाव का होना हो सकता है क्योंकि लोकतंत्र जनता में सिर्फ प्रतिनिधि मूलक सोच ही नही बल्कि सरकारों ,शासको में संवेदनशील सोच का भी संचार करता है । संयुक्त राज्य अमेरिका का सहयोग का हाथ बढ़ाना व युद्ध के स्थान पर प्रतिबंध का रास्ता अपनाना वहाँ के लोकतांत्रिक स्वभाव को प्रदर्शित करता है । उत्तरी कोरिया का विध्वंसात्मक बर्ताव वहां की जनता के विचारों के विपरित की कार्यवाही है अर्थात सम्पूर्ण हथियार ,मिसाइल सिर्फ एक शासक पर टिका हुआ है और इतिहास गवाह रहा है शासक कितना ही ताक़तवर क्यों न हो अन्त का सामना उसे करना ही पड़ा था।

पड़ोसी राज्यो के आर्थिक प्रतिबंधों का परिणाम अभी तक तो नज़र नहीं आया है परंतु चीन के इस सम्बंध में उठाये जाने वाले कदम पर सबकी नज़र रहने वाली है चीन जैसी महाशक्ति के फैसले का कोरिया पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी देखने वाली चीज़ होगी । वर्तमान समय में घटित होने वाली ये घटनाएं यदि नहीं रोकी गई तो भविष्य में कम से कम आर्थिक ,राजनैतिक उथलपुथल का तो ये कारण होंगी ही और अगर उत्तरी कोरिया ने अपने खिलोनो जा प्रयोग कर लिया तो उसके परिणाम 1945 की तस्वीरों में देखने की मिल जाएगा।

-लेखिका अंकिता चौहान नई दिल्ली से हैं | ज्वलंत मुद्दों पर बेबाकी से लिखती हैं |