टोटके में टोका टाकी क्यों ! पढ़िए UP के वरिष्ठ IPS राजेश पांडेय का यह रोचक अनुभव

यूपी के चर्चित वरिष्ठ आईपीएस राजेश पांडेय ने अंधविश्वास को लेकर अपना अनुभव लोगो मे शेयर किया है । उन्होंने समाज मे फैले अंधविश्वास पर लिखते हुए सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं प्रबुध्द लोगो से लोगो को जागरूक करने का आव्हान किया है । पढ़िए उनका यह पोस्ट –
अलीगढ़ शहर में पुराने शहर से नये शहर जाने के लिए रेलवे लाइन पर बना हुआ पुल, जिसे स्थानीय लोग कठपुला कहते है, पुराने शहर से नये शहर को जोडने वाला एक मात्र पुल है, इसका नाम कठपुला शायद इसलिए पड़ा होगा कि अग्रेजों के शासन में यह पुल मजबूत लकडी की या उसकी रैलिंग लकडी के बने होगे। आप इससे पुल की आयु का अन्दाज लगा सकते है। जब आप पुराने शहर के रसलगंज चौराहे से नये शहर के सिविल लाइन की तरफ जायेगे तो सिविल लाइन की ओर ढलान के बांई ओर एक बडे बबूल के पेड पर ढेर सारे रंग-बिरंगे कपडे टंगे हुए मिलेंगे। नौरंगी लाल इण्टर कालेज के परिसर में लगा हुआ बडा बबूल का बृक्ष सडक से कोई 15 फुट ऊँचाई तक निकल गया है, इस पर फेंके गये रंग-बिरंगे कपडे आपका ध्यान जरूर आकर्षित करेंगे ।

मैं अपनी नियुक्ति पर पहले दिन चार्ज लेने लखनऊ से सडक मार्ग द्वारा अलीगढ़ आया था तो इस पेड पर टंगे रंग-बिरंगे कपडो ने मेरा भी ध्यान आकृष्ट किया। मुझे लगभग एक वर्ष की अवधि इस जिले में व्यतीत करते-करते इस प्रकार के दृश्य शहर के अन्य स्थानों पर देखने को मिले, जैसे नादा पुल से सारसौल जाते समय 100-150 मीटर आगे बांए हाथ पर तथा क्वार्सी वाईपास क्यामपुर मोड से पहले दाहिने हाथ पर यह कुछ बृक्ष जिन पर यह रंग-बिरंगे कपडे टंगे हुए है मुख्य मार्ग पर दिखायी देंगे। सम्भव है कि शहर के अन्य स्थानों पर ऐसे बृक्ष और भी होंगे जिन पर रंग-बिरंगे कपडे टंगे होगे।

राजकीय कार्यो से आवागमन करते समय बृक्षों पर पड़े हुए कपड़े मेरे लिए कौतुहल का विषय बने रहे। गाहे-बगाहे अपने साथी अधिकारियों के साथ या अधिकतर अलीगढ़ के जिलामजिस्ट्रेट श्री हृषिकेश भास्कर यशोद के साथ गाडी में आते-जाते इन बृक्षों का जिक्र भी साथ में बैठे अधिकारियों से हुआ किन्तु तमाम बृक्षों के बीच एक ही बृक्ष पर टंगे इन कपडों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी। कभी-कभार अपने वाहन में बैठे ड्राइवर एवं सुरक्षा कर्मियों से भी बात-चीत के दौरान कोशिश की गयी, किन्तु कोई जानकारी नहीं मिल सकी। एक दिन कठपुला से जाते समय एक दुर्घटना को देखने के लिए में अपनी गाडी से उतरा वहां पर खडे पुलिस कर्मी से जानकारी प्राप्त की और बात ही बात में यह पूछा कि इस पेड पर यह कपडे क्यों टंगे हैं तो उसने यह बताया कि शुक्रवार और शनिवार को सूर्योदय से पहले लोग अपना पानी लेकर आते और छोटे-छोटे बच्चों को उसी पानी से नहलाते हैं और उनके भीगे कपडों को उतार कर इसी पेड़ पर टांग देते है, वह ऐसा क्यों करते हैं, इसकी जानकारी मुझे नहीं है। उसने यह भी बताया कि मेरी डियूटी यहीं कठपुला पर रहती है जब मेरी रात्रि डियूटी लगेगी तब मैं इसकी जानकारी करूंगा। इसी प्रकार नादा पुल पर जो सिपाही डियूटी पर रहते हैं एक दिन वहां से गुजरते समय उनसे भी पूछा तो उन्होने भी कुछ ऐसी ही बात बतायी और यह भी बताया कि अबकी बार शुक्रवार एवं शनिवार को रात्रि डियूटी के समय में पता करूंगा। रविवार को कठपुला पर रात्रि डियूटी के समय उपस्थित कांस्टेबिल ने मुझे दोपहर में पूरी जानकारी दी और यह बताया कि शनिवार की सुबह लगभग 04:00 बजे 75 वर्षीय बैसाखी लाल जो शीशियापाडा थाना गांधीपार्क का निवासी है, शिवकुमार के दस वर्षीय और 12 वर्षीय तथा देवान्शु अपने 02 वर्षीय बच्चे को लेकर आये। यह लोग भरे कोहरे और सर्दी में दोपहिया वाहन से अपना पानी लेकर उस पेड के नीचे आये, बच्चो को उसी पानी से थोड़ा-थोड़ा नहलाया और उन कपड़ो को पेड़ पर फेंक दिया और दूसरे कपड़े पहने और घर चले गये। उनको ऐसा करते देखकर सिपाही ने उनसे पूछताछ शुरू कर दी। उम्रदराज बैसाखी लाल ने सिपाही की पूछताछ पर आपत्ति की और कहा कि टोटके में टोका टाकी नहीं की जाती, इससे टोटके का असर खत्म हो जाता है। सिपाही द्वारा एकत्रित की गयी जानकारी के अनुसार जिस स्थान पर यह बबूल का पेड़ है पहले वहां छोंकर का पेड़ था, छोंकर का पेड़ सूखकर खत्म हो जाने पर उसी स्थान पर पनपे इस बबूल के बृक्ष पर यह टोटका करते हैं। अन्धविश्वास के पीछे उनका यह मानना है कि किसी प्रकार का चर्म रोग फोड़े-फुन्सी हो तो इस पेड़ के नीचे नहलाकर उसके कपड़े इस वृक्ष पर फेंक देते है, जैसे ही यह कपड़े सूखेंगे, यह चर्म रोग भी समाप्त हो जायेगा।

छोंकर दरअसल शमी के वृक्ष का स्थानीय नाम है और शमी के वृक्ष की पूजा दशहरे के दिन किये जाने की बात साहित्य में उपलब्ध है। बताया यह गया है कि यदि शमी का वृक्ष उपलब्ध न हो तो आश्मन्तक वृक्ष को ही शमी वृक्ष के बराबर माना जायेगा। इस शमी वृक्ष का वोटेनिकल नाम *“Acasia suma”* है ।

सिपाही ने यह भी बताया कि जिस 02 वर्ष के बच्चे को वहां पानी से नहलाया जा रहा था, वह सर्दी में कांप रहा था और शोर मचा रहा था, लेकिन घरवाले फोड़ा-फुन्सी ठीक होने का हवाला देकर उसे नहला रहे थे।

इन सब बातों को सुनकर मैं हतप्रभ रह गया। अलीगढ में जहां अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भीतर एक मेडिकल कालेज, यूनानी चिकित्सीय पद्धति का प्रसिद्ध तिब्बिया कालेज, मलखान सिंह जिला चिकित्सालय, श्री दीन दयाल उपाध्याय चिकित्सालय और बड़ी संख्या में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने वाली संस्थायें है। माना यह भी जाता है कि यहां शिक्षित लोगों का प्रभाव सभी वर्गो पर है और शिक्षा दीक्षा के मामले में अलीगढ कभी पीछे नहीं रहा हैं। यह तो कोई नहीं बता पाया कि इस अन्धविश्वास के टोटके से किसी का मर्ज ठीक हुआ अथवा नहीं या उन छोटे-छोटे बच्चों का जो किसी गम्भीर चर्म रोग से पीड़ित थे, उनका क्या हुआ, क्योंकि जिस वृक्ष के नीचे बच्चों, बुजुर्गो अथवा महिलाओं को नहलाकर यह कपड़े उस वृक्ष पर फेंके जा रहे न तो वह छोंकर(शमी) है न ही वह आश्मन्तक का वृक्ष है। बबूल के नीचे इस प्रकार की पूजा किये जाने अथवा किसी भी साहित्य में बबूल की पूजा किये जाने का जिक्र नहीं है। वैसे तो इस प्रकार के रोगों को दूर भगाने के लिए वृक्षों के नीचे यह टोटका किया जाना इन्टरनेट सामिग्री में कहीं नहीं मिला, तो निश्चित है कि जिस अन्धविश्वास या टोटके के कारण यह कपड़े इन पेड़ों पर फेंके गये है उससे किसी प्रकार के फायदे की गुन्जाइश नहीं है फिर भी अन्धविश्वास तो अन्धविश्वास है। पेड़ों पर पड़े कपड़ो की संख्या से यह अन्दाज लगाया जा सकता है कि इस अन्धविश्वास को मानने वाले लोगों की संख्या कितनी बड़ी है। सामान्य रूप से इन तीन स्थानों पर इन बबूल के वृक्षों पर पड़े कपड़ों की संख्या एक हजार से ऊपर होगी मतलब अन्धविश्वास पर इस टोटके को मानने वाले इतने लोग यहां आ चुके है।

टोटका करते समय टोका टाकी न किये जाने का एक वाकया मुझे बचपन का याद है जब बचपन में हम सभी भाई-बहन पूरे परिवार के साथ दीपावली मनाने कभी-कभी अपने गांव जाते थे। दीपावली के दूसरे दिन भोर में 03-04 बजे के बीच पूरे गांव में सूप-चलनी वाली सूप की बजने की आवाज एक साथ आती थी। रात में सोने से पहले घर की बड़ी बुजुर्ग महिलायें यह बताती थी कि सवेरे सूप बजने की आवाज आयेगी कोई बोलना मत। जब अगले दिन हम उम्र बच्चे इकट्ठे होते थे तो यह बताया जाता था कि किस घर में किस बच्चे की पिटाई हुई है। एक अन्धविश्वास के अनुसार दीपावली के अगले दिन पूरे घर में इस तरह सूप को बजाकर घर की महिलायें दरिद्र नारायण (दरिद्र) को घर से भगाती है ताकि साल भर दीपावली की रात स्थापित लक्ष्मी घर में रहे और दरिद्र नारायण घर छोड़कर भाग जायें। जिस घर में किसी ने टोका टाकी कर दी तो दरिद्र नारायण साल भर घर में रहते हैं और उनको भगाने के लिए अगले साल तक दीपावली का इन्तजार करना होता है, यह अन्धविश्वास है, जो अभी भी उत्तर भारत के ढेर सारे क्षेत्रों में माना जाता है। इसे अन्धविश्वास इसलिए कह रहा हूँ कि 40 साल बाद आज भी कोई हमारे गाँव जायेगा तो गरीबी और दरिद्रता के सूचकांक बहुत से घरों में अभी भी मिलेंगे। हर साल दरिद्र नारायण भगाने के , टोटके के बाद भी बहुत से घरों में दरिद्रता ज्यों की त्यों है।

चूँकि सिपाही ने यह भी बताया कि टोटके के बारे में पूछने पर आपत्ति हुई थी और यह बताया कि टोटके में टोका टाकी न की जाये। मैंने नादा पुल वाले सिपाही से यह स्पष्ट कर दिया था कि अब किसी से उसके इस अन्धविश्वास के बारे में कोई पूँछतांछ न की जाये। क्योंकि इन्टरनेट पर उपलब्ध सूचना के अनुसार इस प्रकार के अन्धविश्वास को रोकने के लिए कोई कानून नहीं है। महाराष्ट्र में *The Maharashtra Prevention and Eradication of human Sacrifice and other Inhuman, Evill and Aghori Practices and Black Magic Act, 2013.* कानून है तथा कर्नाटक विधान सभा में *Karnataka Prevention of Superstitious Practices Bill, 2013,* पास किया गया है। विश्व के अन्य देशों में जैसे ब्रिटेन में *Witchcraft Act 1542* पाया गया। आस्ट्रेलिया तथा अमेरिका के राज्य *नॉर्थकेरोलिना और Popua new guinea* में इस तरह के कानूनी प्राविधान का बहुत विरोध किया गया और उन्हे समाप्त कर दिया गया। इसका आशय यह है कि इन देशों में किसी अन्धविश्वास अथवा टोटके का माना जाना सही है, जिसे रोकने के लिए कोई कानूनी प्राविधान नहीं है।

यहां यह यक्ष प्रश्न है कि आखिर छोटे-छोटे बच्चों, बुजुर्ग के स्वास्थ्य के साथ यह खिलवाड़ कितना जायज है। इन पेडों पर टंगे हुऐ कपडों की औसत कीमत 100 रूपये से अधिक ही होगी यदि इन्ही पैसों में किसी डॉक्टर से सलाह करके जैेनरिक दवा ले ली जाये तो शायद मर्ज बिगड़ने से पहले ही पूरी तरह ठीक हो जायेगा ।

इस अन्धविश्वास की जड़ इतनी गहरी है कि पेडों पर फेंके गये इन कपडों को कोई छूता भी नहीं है, चोरी भी नहीं करता, शायद इस कारण से कि इन्हे इस्तेमाल करने से कोई रोग पहनने वालों को नहीं लग जाये। यदि यही कपडे पेड़ के अलावा अन्य दूसरे स्थान पर मिल जाये तो निश्चित रूप से उन्हे फिर से ढूंढना मुश्किल होगा।

शिक्षा, सलाह, अन्धविश्वास की सही जानकारी दिया जाना ही शायद इसको दूर भगाने का सही उपाय होगा, लेकिन यह करेगा कौन? जो भी इस कार्य में हाथ लगायेगा वह धर्म विरोधी, वर्ग विरोधी, समाज विरोधी माना जायेगा।

अन्धविश्वास के इस तरह के टोटके को मानने वालों का यह समूह आसाराम बापू, बाबा रामरहीम, बाबा रामपाल जैसे कुत्सित बाबाओं के सॉफ्ट टारगेट होते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि कोई नया बाबा आश्रम में छोंकर(शमी) के पेड़ लगवाकर बैठ जाये और इन भोले भाले अन्धविश्वास टोटके के मानने वाले उसके झांसे में आ जायें और एक नया आश्रम चल पड़े और फिर वही कहानी दोहराई जाये जो समय-समय पर आसाराम बापू, बाबा रामरहीम, बाबा रामपाल के आश्रम में हुई है।

अब तो यही लगता कि यह समाज का गुरूतर दायित्व है कि किसी के स्वास्थ्य के मामलों में मानव जीवन से खिलवाड़ करने वाले ऐसे अन्धविश्वास, टोटके, गन्डा, ताबीज, मन्त्र, पीर, मजार की चादरें, शमशान घाट पर औघड़ क्रियाओं के बारे में सही जानकारी देकर लोगों को जागरूक करना होगा। लोगों को यह भी बताना होगा कि किसी भी मर्ज को भूत, प्रेत, शैतान, जिन्न, छाया, बरम आदि बताकर इलाज करने वाले ढोंगी, पाखण्डी और समाज के साथ धोखा करने वाले लोग हैं। इन अन्धविश्वास टोटकों से कोई रोग, बीमारी, अवसाद कभी दूर नहीं हो सकते। इसके लिए सहज सुलभ चिकित्सीय सहायता ही एक मात्र उपाय है।
इस अन्धविश्वास को समाप्त करने में समाज सेवी संस्थायें, शासकीय एवं प्रशासनिक अधिकारी व कर्मचारीगण आगे आकर लोगों को जागरूक करने में सहायक हो सकते हैं।

– लेखक राजेश पांडेय यूपी के वरिष्ठ आईपीएस हैं और अलीगढ के वर्तमान एसएसपी हैं ।