‘यह विचार विकास का नहीं विनाश का है’ पढ़िए देश की सोच को आईना दिखाता अंकिता चौहान का यह आर्टिकल

अंकिता चौहान /नई दिल्ली-
पिछले दो चार दिनों से दिल्लीवासी छुट्टियों का आनंद उठा रहे है, सरकार ने लोगो को घरो में रहने की सलाह दी है, स्कूल बंद कर दिए गए है, दफ्तर जाने के लिए दस बार सोचना पड़ रहा है। नहीं कोई त्योहार नहीं है, न ही किसी महापुरुष की जयंती है व ना ही शनिवार और रविवार है | इन छुट्टियों का कारण तो प्रदूषण है। दिल्ली में प्रदूषण का स्तर इस कदर बढ़ चुका है कि लोगो को घर से बाहर न निकलने की सलाह दी गई है | इसलिए लोग आजकल प्रदूषण वाली छुट्टियां मना रहे है | 50 सिगरेट के धुए जितनी ख़तरनाक ये हवा दिल्ली को बीमार, बहुत बीमार करने के लिए काफी है | प्रदूषण मास्क केज बिक्री एक दम से बढ़ गई है चाय की दुकानों पर, बसो में, गलियों में प्रदूषण को लेकर तर्क वितर्क आरंभ हो गए है सभी अपनी अपनी दिमागी उपज ए बढ़ते प्रदूषण के कारण खोजने व्यस्त दिखाई पड रहे है ।

अचानक से आई इस दूषित हवा ने हमे थोड़े समय के लिए ही सही परंतु अपने वातावरण पर सोचने को मजबूर किया है, यह भारतीय संस्कृति /परम्परा का एक अभिन्न हिस्सा है कि जब तक हम कोई मुसीबत झेल ना ले , उसके बुरे परिणामों से रूबरु ना हो ले तब तक मस्तिष्क की नसों पर सोचने समझने का दवाब नहीं डालते। सुरक्षा मज़बूत होगी पहले हमला होने दो, डेंगू चिकनगुनिया से लड़ेंगे पहले इसके कुछ केस आने दो। प्रदूषण पर भी यही हालत है जब तक साँस लेने के लिए ना करनी पडे तब तक जनता व सरकार पर्यावरण जैसे मुद्दों के पास भी नहीं जाते। भारतीयों के भीतर खतरों के खिलाड़ी वाली प्रवृति होना स्वाभाविक सा लगता है जानते हुए कि हमारे आज के क्रियाकलाप भविष्य में जानलेवा साबित हो सकते हैं फिर भी उसमे निरंतरता बनाए रखने के लिए एक मज़बूत कलेजे की आवश्यकता होती है या यू कहे की बिना उपयोग किए मष्तिष्क की।

“धारणीय विकास” की अवधारणा मानव समाज से इन दिनों ऐसे गायब हुए मानो गंजे के सर से बाल | विकास की परिभाषा को हमने सिर्फ GST, स्वच्छ भारत, अंतरिक्ष यान तक ही सीमित कर दिया है | वास्तव में ये विचार विकास का नहीं विनाश का है। आपसी मतभेद वास्तविक मुद्दों से हमे बहुत दूर धकेल देते है, हमारा पर्यावरण इन्ही मुद्दों में से एक है, राजनीति संगठन पर्यावरण के मुद्दे पर असहाय क्यूँ हो जाते है क्यूंकि इस मुद्दे पर शायद ही वोट लामबंध हो सके ऐसा इसलिए होता है कि जितना हम अपने धर्म, जाति, वर्ग को लेकर संवेदनशील होते है उतना पर्यावरण के प्रति नहीं हो पाते और चुनावी मुद्दों में यह अपना स्थान नहीं बना पाता।
दिल्ली के बढ़ते प्रदूषण का कारण लोग है क्यूंकि यह लोगो के द्वारा किया गया है | लोगो के लिए किया गया है और इसे भुगत भी लोग ही रहे है।
भविष्य में भारत के लिए स्वस्थ वातावरण का निर्माण करने में जनता व प्रशासन सिर्फ चर्चा के माध्यम से अपना योगदान दे रहे है, चर्चा के अलावा कुछ करने योग्य नहीं बचा है। हवा में हाथ पैर चलाने वाले सरकारी प्रयास सफल नहीं हो पा रहे है जनता ढ़ीट बनी हुई है और एक असंवेदनशील समाज का निर्माण अपने पर पहुचने वाला है।

साधारणतः जहां समस्या होती है वहां समाधान होता है परंतु यहाँ, जहां समस्या है वहा सिर्फ चर्चा है, बड़ी बड़ी अरोप प्रत्यारोप वाली चर्चाएं। सभी संसाधन, राजनीति प्रभुसत्ता के होते हुए भी कोई राष्ट्र इतना असहाय न रहा होगा जितना आज भारत है। यहां सतत विकास जैसे मुद्दे राजनीतिक संगठनो के चुनावी विषय होने चाहिए, पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता उनकी वास्तविक देशभक्ति का प्रमाण होना चाहिए। क्यूंकि स्वस्थ पर्यावरण स्वस्थ मस्तिष्क व स्वस्थ शरीर का निर्माण करता है और एक नागरिक का स्वस्थ शरीर ही देश की उन्नति का महत्वपूर्ण घटक होता है।

– लेखिका अंकिता चौहान नई दिल्ली से हैं | समाज के विभिन्न मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखती हैं |