बिहार बंद लालू के बेटों के राजनैतिक बचपने का सूचक ! पढ़िए अंकिता चौहान का यह आर्टिकल

अंकिता चौहान/नई दिल्ली –
आमतौर पर किसी भी राज्य में राजनीतिक टकराव या संघर्ष का कारण जनहित से जुड़ा होता है या चुनावी प्रतिद्वंदिता से लेकिन 21 दिसंबर को बिहार में जो राजनीतिक तमाशा हुआ उसका कारण सिर्फ बालू (रेत) था। पिछले कई वर्षो से बिहार में चली आ रही बालू खनन नीति को बिहार सरकार ने बदल दिया ,बालू बिहार की सियासत को गर्म करने का हमेशा से एक मुद्दा रही है यही गर्मी गुरुवार को बिहार में दिखाई दी जब नीतीश कुमार की नई खनन नीति के खिलाफ आरजेडी ने बिहार बंद कराया।

जितनी बूरीहालात इस बंद के बाद बिहार की हुई है उससे इस बंद के सफल होने का अंदाज़ा लगाया जा सकता है इस बंद को राजनीतिक तमाशा इसलिये कहा गया है क्योंकि बिहार सरकार के नई खनन नीति के वापस लिए जाने के बाद भी इस तरह का ढोंग आरजेडी द्वारा रचा गया। पहली नज़र में ही यह घटिया सामाजिक ,राजनीतिक सोच का परिचय देता है शांत पड़े सियासी माहौल में बेसुरा नाच गाना कर लालू प्रसाद के पुत्रों ने जनता की कुढ़ने पर मजबूर कर दिया। पूरे राज्य में वाहनों की आवाजाही पर व्यापक असर पड़ा ,वैशाली जिले में एम्बुलेंस के जाम से फसने के कारण एक महिला की मृत्यु हो गई, कई रास्तो को बंद कर आगजनी की गई,ट्रैन रोकी गई ,दुकान को जबरन बंद कराया गया,आम जनजीवन अस्त व्यस्त रहा। वो बात अलग है कि ऐसे किसी भी प्रकार के हिंसक विरोध का कोई औचित्य नही था परन्तु लालू के दिनों लालो ने बिहार बंद कराकर स्वयं की नकली महानता के झंडे गाड़ दिए। उनकी राजनीतिक हठधर्मिता ने खो चुके इस प्रकार के राजनीतिक स्वांग को वापस ला दिया।

ट्रैफिक जाम,बंद आगजनी रोष प्रदर्शन ,ज़रा सोचिये हमारा देश आखिर किन बातों के लिए दुनिया मे चर्चा पा रहा है। यह बात अपनी स्थान पर है कि हर नागरिक को अपनी बात कहने और कोई सुनवाई न हो, तो सड़क रेल रोक देने का हक़ है परंतु उनका क्या जो उस जाम में अपनी ज़िंदगी की आखरी सांसो ले रहा हो ,वो जो परीक्षा के लिए जा रहा हो। सत्ता के मोह ने इन नेताओं की दबंगई को इनका चरित्र बना दिया है और जनता के सामने लाचारगी के अलावा कोई विकल्प नही बचता। इसी बंद में जहां एक तरफ पूरे दिन लोग जाम में फसे रहे ,मरते रहे दूसरी तरफ नाचगाना कर बंद का जश्न बनाया गया जिनका मोर्चा लालू प्रसाद के दोनों बेटों ने संभाला हुआ था ये सब देखकर उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता पर कोई संशय नहीं रहता ।

10734 लोगो की निरोधात्मक गिरफ्तारी ,कानून तोड़ने के 18 मामले बंद नहीं ,गुंडागर्दी के प्रतीक होते है युवा नेताओ के गर्म खून ने शांतिपूर्ण ढंग से विरोध के विषय मे सोचना भी उचित नहीं समझा। 27 नवंबर 2017 को हाइकोर्ट द्वारा नई नीति को वापस लेने के निर्दश के पश्चात बिहार सरकार ने इस नीति में बदलाव करना और सारे संशोधन को वापस लेना पड़ा।बिहार में बालू खनन बहुत बड़ा व्यवसाय रहा है जिससे 50 लाख लोगों की रोजी रोटी जुड़ी है बिहार के कई नेताओं की हिस्सेदारी और भ्र्ष्टाचार जैसी शिकायतें भी इससे आती रही है बालू खनन में माफिया संघर्ष और हिंसक झड़पें भी हो चुकी है

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नई नीति के तहत बालू के खनन ,ट्रांसपोर्ट बफर स्टाक और खरीद -बिक्री को खत्म करने के लिए नई बालू नीति बनाई गई थी। खनन में जीपीए सिस्टम भी लगाया गया जिससे सालो से चल रहा काम प्रभावित हुआ और बालू उत्पादन में गिरावट आई । इसी नीति के विरोध में ट्रांसपोर्ट और राजनेताओं ने मोर्चा खोल दिया व मजदूरों की रोज़ी रोटी छीनने का आरोप लगाया ।बिहार में विपक्ष ने अपनी राजनीतिक उपस्तिथि दर्ज कराने ,सत्ता के लिए स्वयं को विकल्प के रूप में दिखाने के लिए विरोध का ऐसा रास्ता चुना। वर्तमान राजनीतिक माहौल मुद्दों को सुलझाने ,उनके निवारण के लिए बातचीत ,वाद विवाद ,सहयोग ,परामर्श को तवज्जो देता है । निर्णय निर्माण की धारा से अलग होकर सड़को पर शोर मचाने से सिर्फ कुछ वोट मिल सकते है परंतु समाधान नहीं ।

किसी भी प्रकार की असहमति या विरोध शांतिपूर्ण तरीको से जताया जा सकती है ।उग्र आंदोलन अब सिर्फ अपरिपक्व राजनीतिक बुद्धि, बेवकूफी और भविष्य के प्रति उत्तरदायित्व न होना ही दर्शाता है।नई नीति के वापस लिए जाने के बावजूद यह बंद सत्ता से बेदखली की खीज़ थी और यदि अधिक गहराई में जाया जाए तो लालू प्रसाद के चारा घोटाले में सुनवाई के बाद कि तैयारी थी।

-लेखिका बेबाकी से ज्वलंत मुद्दों पर अपनी राय रखती हैं |