मोदी लहर के खिलाफ हैं DU & JNU छात्रसंघ चुनाव के नतीजे, पढ़िए अमन शर्मा का यह आर्टिकल

देश भर में मोदी लहर के बाद भी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुए छात्र संघ चुनावों (दिल्ली विश्वविद्यालय) के नतीजों ने सभी को चौंका दिया है। डीयू और जेएनयू को छात्र राजनीति के लिए सबसे महत्वपूर्ण जगह माना जाता है। ये कहा जाता है की अगर किसी को राजनीति मे भविष्य तलाशना है तो उसे दिल्ली विश्वविद्यालय की राजनीति का हिस्सा जरूर होना चाहिए। डीयूएसयू चुनाव में एनएसयूआई को पिछले चार साल से हार का सामना करना पड़ रहा था। पिछली साल जॉइंट सेक्रेटरी पद पर एनएसयूआई ने जीत हासिल की थीं। इस बार अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर एनएसयूआई  ने कब्जा किया है। एनएसयूआई और एबीवीपी ने दो-दो सीटों पर जीत हासिल की है।अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर एनएसयूआई  ने कब्जा किया है। वही सचिव और संयुक्त सचिव पद पर एबीवीपी  ने  अपना परचम लहराया है। इस साल चुनाव में डीयू के छात्रों ने बढ़ चढ़कर मतदान किया। पिछले साल जहां  चुनाव में 36.9 फीसद वोट पड़े थे अब वहीं इस साल मॉर्निंग कॉलेज के 32 कॉलेजों में ही कुल 44 फीसद वोट डाले गए।मॉर्निंग कॉलेज के 77,379 छात्र-छात्राओं में से 34,051 छात्र-छात्राओं ने चुनाव में मतदान किया है।

दिल्ली स्थित दो विश्वविद्यालयों के छात्र संघ चुनाव नतीजों में सबसे उल्लेखनीय तथ्य यही है कि जेएनयू के वामपंथी किले को एबीवीपी भेद नहीं पाई। यह कहना शायद सही नहीं होगा कि अपने आसपास के माहौल से प्रभावित न रहने की जेएनयू की परंपरा इस बार भी कायम रही। सोचने वाली बात यह है कि आखिर उसकी राजनीति में ऐसा क्या है ? जो स्थापित राजनीतिक धाराओं का विकल्प चाहने वाले युवाओं को आकर्षित कर रहा है ? जेएनयू और डीयू की छात्र राजनीति की संस्कृति शुरू से ही अलग रही है। जेएनयू कैंपस यूनिवर्सिटी है | उसे एक खास योजना के तहत बनाया गया था। वहां पढ़ाई-लिखाई का सबसे अलग माहौल रहा है। वहां छात्र राजनीति शुरू से ही अपेक्षाकृत उच्च बौद्धिक स्तर लिए रही । सभी वामपंथी संगठनों को मिले वोटों को जोड़कर देखा जाए तो यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह वातावरण आज के इस दौर में भी कितना सशक्त है। जबकि देश की सियासत में वामपंथी दलों का अभूतपूर्व पराभव हो गया है। डीयू में यह कवच नहीं है। वहां छात्र राजनीति आम राजनीतिक रुझानों और भावनाओं के मुताबिक चलती है। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि दोनों विश्वविद्यालयों में दिखे रुझान उनकी अपनी-अपनी परंपरा के अनुरूप ही हैं |  देश की सियासी हवा उन्हें ज्यादा नहीं बदल पाई।

-लेखक अमन शर्मा जयपुर से हैं | युवाओ और देश के ज्वलंत मुद्दों पर बेबाकी से लिखते हैं |