मंदिर से शुरू मंदिर पर खत्म, यक़ीनन आज भी गुजरात सदियों पीछे हैं, जरुर पढ़े गुजरातियों को आईना दिखाता यह आर्टिकल

अंकिता चौहान/नई दिल्ली –
कल 14 दिसंबर को गुजरात विधानसभा चुनाव के आखिरी चरण का मतदान है। सितंबर माह से सभी नेता जिस भागदौड़ में लगे थे वह कल चैन की सांस लेंगे । गुजरात मे परिणाम चाहे जिसके भी पक्ष में रहे परंतु इन चुनावों में गुजरात मे स्थित सभी बड़े मंदिरो के नाम सबको ज़रूर याद हो गए होंगे। जितनी तेज़ी व श्रद्धा से हमारे नेता एक मंदिर से दूसरे मंदिर जा रहे है, ऐसा लग रहा है मानो गुजरात का ब्रैंड एम्बेसडर बनने को होड़ चल रही हो । इन चुनावों में मंदिरो का अपना महत्वपूर्ण स्थान रहा है, श्रद्धा भक्ति पर आधारित लड़ा गया यह पहला चुनाव होगा। कौन हिन्दू धर्म के अधिक करीब है ,कौन अधिक धार्मिक है, प्रतिनिधि चुनने का बस यही मापदंड है निर्धारित लगता है। गुजरात चुनावो में शुरुआत से अंत तक मंदिर ही आकर्षण का केंद्र रहे है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत कच्छ आशापुरा मंदिर से की थी | अंतिम चरण के मतदान से पहले कल अंबाजी मंदिर जाकर अपने हिंदू होने की और पुष्टि की । वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने चुनाव अभियान का आरंभ सितंबर में द्वारका मंदिर में जाकर किया था और कल जगन्नाथ मंदिर जाकर चुनावो का समापन कर दिया। इस बीच गुजरात के हर शहर हर कस्बे में कोई ऐसा बड़ा मंदिर नही छोड़ा गया जहां जाने कि खबर मीडिया में न आई हो ।

मंदिरो के दौरों ने यह बात दिया कि जनता का हाल जानने से पहले ईश्वर का आशीर्वाद अधिक महत्व रखता है। किसी भी राजनीतिक दल की चुनावी रणनीति व प्रचार का तरीका जनता की आकांक्षाओं,सोच व विचारों के अनुरुप तय होता है अगर हमारे राजनीतिक दलों ने चुनाव जीतने के लिये वाद विवाद, जीवन मूलक सुविधाओं, भविष्य निर्माण के स्थान पर धार्मिक धरातल पर चलने का रास्ता अपनाया है तो जाहिर है जनता ने इस प्रकार कि प्रचार की उम्मीद लगाई होगी अर्थात धार्मिक आधार पर चुनाव लड़ने के फ़ैसले को जनता ने स्वीकृति दी है ये दर्शाता है। राज्य में बिल्डिंग बनाने से ,पुल बनाने से ,सड़क बना देने से लोगो की सोच भी बदले ऐसा ज़रूरी नही ,हो सकता है भौतिक रुप से गुजरात मे विकास हुआ हो लेकिन अगर जनता ने मंदिरो के इन दौरों से नेताओ को मत देने का फैसला लिया हो तो यकीनन गुजरात आज भी सदियों पीछे है ।

विकास एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव पर जाने का नाम है | वैचारिक रूप से ऐसी कोई गतिविधि यहाँ दिखाई नही दी। जिस प्रकार से संचार के माध्यमो का,टेक्नोलॉजी का विकास हुआ है वह धार्मिक धुएं को छांटने का काम करता है पर यहाँ विकास बनाम विचार जैसा दूर दूर तक दिखाई नही पड़ता।
हमारे देश में मंदिरों का आना ही वोट बैंक है | 60 साल पहले भी ऐसा ही था, 20 साल पहले भी ऐसा ही था और आज भी ऐसा ही है | जब धर्म के नाम पर वोट मांगने की बात आती है तब हम वही के वही होते है जहां से लोकतांत्रिक बदलाव आरंभ किये थे। गुजरात मे आरक्षण आंदोलन, राज्यसभा चुनाव ,मोदी मैजिक ने पहले ही कई वास्तविक मुद्दों को दबा दिया है | मंदिर भ्रमण की इस परिपाटी ने बची कुची उम्मीद भी छिन ली।

मंदिर जाने के राजनीतिक लाभ भी बहुत होते है | धर्म विशेष के प्रति प्रेम ,भारतीय प्राचीन संस्कृति के ज्ञान का दिखावा, मंदिर के नाम पर भ्रमण ,ईश्वर से जुड़ाव का संदेश व सबसे अहम गरीबो के लिए दुआ मांगना ।सभी काम सिर्फ एक मंदिर का दौरा पूरा कर सकता है जो चुनाव जीतने के लिए काफी है | आने वाले 5 -7 सालो में इसका विकल्प भी नज़र नही आ रहा ,फिलहाल हमको धार्मिक ज्ञान तक ही स्वयं को समेटे रखना होगा । यह अलग बात है कि गुजरात चुनाव तो मंदिर से शुरू होकर मंदिर पर खत्म हो ही गए । जनता ने किस पार्टी को मंदिर जाने का क्रेडिट दिया है यह अठारह दिसम्बर को सभी के सामने आ जायेगा |

-लेखिका अंकिता चौहान सामाजिक एवं राजनैतिक मुद्दों पर बेबाकी से लिखती हैं |