अपराधियों का गढ़ बना यूपी, सरकार अंकुश लगाने में विफल

समाजवादी पार्टी की सरकार का तख्ता पलट करने के बाद उत्तर प्रदेश की जनता ने एक तरह से राहत की साँस ली थी। लोगों को लगा था कि और कुछ हो या न हो किन्तु अपराधियों के हौसले जरूर पस्त होंगे परन्तु दुर्भाग्य से बीते ढाई माह में ऐसा कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा है। नयी सरकार बनने के बाद सैंकड़ों पुलिस अधिकारी इधर से उधर हो गये परन्तु अखबार के पन्नों पर अपराध की खबरें आज भी वैसे ही जमी हुयीं हैं जैसे सपा सरकार के समय थीं। उसके बाद सत्ता पक्ष के नेताओं के गैरजिम्मेदाराना बयान प्रदेशवासियों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। प्रदेश सरकार के एक मन्त्री का बयान आया कि पिछली सरकार के मुकाबले हमारी सरकार में हत्याएं कम हो रही हैं तो दूसरे मन्त्री ने उनसे भी दो कदम आगे जाकर कह दिया कि सरकार यू.पी. में क्राइम रेट जीरो नहीं कर सकती है। जबकि सरकार के मुखिया को आपराधिक घटनाओं में विपक्ष का षड्यंत्र दिखायी दे रहा है। प्रदेश में अपराधियों के बुलन्द हौसलों का प्रमाण देने के लिए ग्रेटर नोएडा तथा रामपुर की घटनाएं पर्याप्त हैं। भाजपा सरकार की इस अल्प अवधि में हत्या, लूट, डकैती, अपहरण, बलात्कार, साम्प्रदायिक तथा जातीय संघर्ष तक की बड़ी−बड़ी घटनाएँ घट चुकी हैं। अब प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि योगी सरकार क्या वास्तव में प्रदेश को अपराधमुक्त करा पायेगी? जैसा कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी समेत भाजपा के सभी बड़े नेताओं ने चुनाव के समय दावे किये थे। या फिर उनका वह दावा हवा हवाई ही साबित होगा? क्योंकि सरकार की ओर से अपराध रोकने के लिए अब तक नया कुछ भी नहीं किया गया है।

सवाल प्रदेश में बढ़ते अपराध पर अंकुश लगाने के लिए नयी सरकार की प्रतिबद्धता पर नहीं है परन्तु इस हेतु सरकार की ओर से अब तक कोई नवीन कार्ययोजना भी प्रस्तुत नहीं की गयी है। जिसके आधार पर यह सुनिश्चित हो सके कि प्रदेश में अब अपराधियों की खैर नहीं है। इससे तो यही पता चलता है कि चुनाव से पूर्व भजपा ने प्रदेश की सबसे अहम समस्या से निपटने के लिए कोई कार्य योजना ही नहीं बनायी थी क्योंकि अगर ऐसा कुछ होता तो सरकार आज उसी को अमल में ला चुकी होती। सरकार भले ही नयी हो परन्तु अपराध नियन्त्रण के उसके तरीके पुराने ही हैं। पिछली सपा−बसपा सरकारों ने सत्ता संभालते ही सर्वप्रथम प्रशासनिक अधिकारियों का बड़े पैमाने पर फेर बदल किया था। योगी सरकार भी कर रही है। कोई बड़ी वारदात होने के बाद पिछली सरकारों में सिपाही से लेकर बड़े अधिकारियों तक का या तो स्थानान्तरण कर दिया जाता था या फिर निलम्बन। नयी सरकार में भी यही सब हो रहा है। जब सब कुछ वैसा ही है तब फिर अपराध भी वैसे ही हो रहे हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा? जिस पुलिस की सोच ही अपराधियों को संरक्षण देना बन चुकी हो, भ्रष्टाचार जिसके रक्त में शामिल हो चुका हो। बड़ी से बड़ी और खुलेआम हुई घटनाओं में भी पीड़ित पक्ष के प्रति संवेदनहीनता दिखाते हुए उसके द्वारा लगाये गये आरोपों को सिरे से खारिज करने का हर संभव प्रयास करना जिसकी आदत बन चुकी हो, जांच के नाम पर मामले को लम्बा खींचना जिसका उसूल बन चुका हो, उस पुलिस को क्या सिर्फ स्थानान्तरण और निलम्बन जैसे दंड से दुरुस्त किया जा सकता है? निलम्बित और लाइनहाजिर हुए किसी भी पुलिस वाले से कभी बात करके देखिये, वह आपको पूर्ण आनन्द में ही दिखायी देगा। उसे मालूम होता है कि इस तरह के दंड से उसके ऊपर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ने वाला। आज नहीं तो कल फिर वापस वैसे ही लग जाना है।

ग्रेटर नोएडा की घटना में पुलिस द्वारा अब तक की गयी कार्रवाई और बयानबाजी से कतई सन्तुष्ट नहीं हुआ जा सकता है। पुलिस की आँखों के ही सामने से बदमाशों का भाग जाना और पुलिस द्वारा उन्हें पकड़ने की कोशिश न करना प्रथम दृष्टया ही पुलिस की नियति पर शक पैदा करता है। इस सन्दर्भ में एस.एस.पी. का वह बयान भी आश्चर्यचकित करने वाला है, जिसमें कहा गया है कि पुलिस को यह नहीं पता था कि बदमाश कितने हैं और उनके पास क्या हथियार है। इस कारण तत्काल बदमाशों का पीछा नहीं किया गया। बाद में और पुलिस बल आने के बाद कांबिंग शुरू की गयी लेकिन बदमाशों का कुछ पता नहीं चल सका। अब इससे ज्यादा गैरजिम्मेदाराना बात भला और क्या हो सकती है? पीड़ितों से बदमाशों के हथियारों और संख्या के बारे में जानकारी लेने के लिए पुलिस को आखिर कितने घंटे चाहिए थे? क्या बदमाश इतने मूर्ख थे कि और पुलिस बल आने तक प्रतीक्षा करते रहते। घटनास्थल से महज तीन किमी दूर स्थित कोतवाली से पुलिस को पहुँचने में दो घंटे लग जाते हैं। उसके बाद भी पुलिस बिना किसी तैयारी के पहुँचती है और बेखौफ दरिन्दे उसकी नाक के नीचे से निकल जाते हैं। इतनी असहाय और अशक्त पुलिस के भरोसे यदि भाजपा सरकार प्रदेश की ध्वस्त कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने का स्वप्न देख रही है तो इसे सरकार का भ्रम ही कहा जायेगा। पीड़ित परिवार द्वारा चीख−चीख कर कहा गया कि मासूम बच्चों व पुरुषों के सामने ही घर की महिलाओं की अस्मत लूटी गयी है लेकिन पुलिस ने इसे झुठलाने का प्रयास करके घोर संवेदनहीनता का ही परिचय दिया है। बलात्कार के मामले में उच्चतम न्यायालय तक कह चुका है कि कोई भी महिला बलात्कार का झूठा आरोप किसी पर कभी नहीं लगा सकती है क्योंकि यह उसकी अपनी इज्जत से जुड़ा मामला है लेकिन पुलिस के अनुसार पीड़ित परिवार इतना बेशर्म हो गया है कि खुलेआम अपनी इज्जत उछाल रहा है। अपराध छोटा हो या बड़ा जाँच के बिना पुलिस की कार्रवाई आगे कदापि नहीं बढ़ती है। भले ही पीड़ित से लेकर मीडिया तक सभी अपराध के बिन्दुवार तथ्य क्यों न प्रस्तुत कर रहे हों।

योगी सरकार प्रदेश को अपराधमुक्त करने के लिए यदि वास्तव में कृत्संकल्पित है तो उसे सर्वप्रथम पुलिस की कार्यप्रणाली में परिवर्तन लाते हुए सख्त रवैया अपनाना होगा। स्थानान्तरण, लाइनहाजिर और निलम्बन जैसे दंड की अपेक्षा नौकरी से बर्खास्तगी तथा इससे भी अधिक सख्त दंड सुनिश्चित करना होगा। जिस दिन सरकार का भय पुलिस में व्याप्त हो जायेगा उसी दिन पुलिस का भय अपराधियों की नीद उड़ा देगा। मौजूदा पुलिस व्यवस्था अंग्रेजों के समय की है। पुलिस सुधार के लिए अब तक कई मसौदे बने परन्तु राजनीतिक इच्छा शक्ति के आभाव में आज तक उन्हें लागू नहीं किया जा सका है। वर्तमान में केंद्र और राज्य में भजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकारें हैं। अतः इस दिशा में भी सरकार को गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए।

जब भी कोई सरकार पुलिस की लगाम कसती है तब सुरक्षा के नाम पर शहर के व्यस्ततम चौराहों पर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया जाता है। जिसकी रूचि न तो अपराधी पकड़ने में होती है और न ही उक्त चौराहे की यातायात व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित कराने में ही होती है। अगर किसी काम में उसकी रूचि होती है तो वह है वाहन चेकिंग। दर्जनों पुलिस कर्मी सड़क किनारे खड़े होकर आम जनमानस को वाहन के कागज दिखाने के लिए रोकते हैं और जरा सी कमी पर उगाही कर लेते हैं या फिर कुछ एक का चालान काट देते हैं। दो थानों की पुलिस के बीच सीमा जैसा कोई प्रावधान नहीं है परन्तु अनेक मामलों में पुलिस का सीमा विवाद अक्सर सामने आ जाता है और पीड़ित व्यक्ति को कई बार सहायता के अभाव में जानमाल का भारी नुकसान उठाना पड़ता है जबकि नियम यह है कि पीड़ित व्यक्ति जिस थाने की पुलिस के पास पहले पहुँच जाये उसे ही सर्वप्रथम पीड़ित को सहायता प्रदान करनी चाहिए। बाद में जांच तथा आगे की कार्रवाई हेतु मामले को सम्बंधित थाने में स्थानान्तरित कर देना चाहिए। सरकार को इस जैसे अन्य अनेक तथ्यों पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार करते हुए यथाशीघ्र सख्त कदम उठाना चाहिए।भाजपा नेतृत्व को अपने विधायकों तथा मन्त्रियों के बेतुके बोल बोलने पर भी अंकुश लगाना होगा। सरकार को ध्यान रखना होगा कि प्रदेश की जनता ने सपा और बसपा सरकार के दौरान दिल दहला देने वाली बड़ी−बड़ी आपराधिक घटनाएँ देखी हैं। चुनाव के समय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह जैसे नेताओं ने अपने भाषणों में प्रदेश को अपराधमुक्त करने के लिए बारम्बार आश्वासन दिया था। प्रदेशवासियों ने उनके उस आश्वासन पर विश्वास करके ही भाजपा को अप्रतिम बहुमत के साथ सत्ता सौंपी है। अब बारी नयी सरकार की है कि वह उन आश्वासनों पर खरी उतरे। बेरोजगारी, महंगाई, प्रदूषण, सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को वर्षों से झेल रही जनता को सरकार से सुरक्षा की ही सर्वाधिक दरकार है।

डॉ. दीपकुमार शुक्ल