गुस्से में दिया था तलाक, पत्नी का हलाला न कराने पर पति को भुगतना पड़ा ये सब-

बहराइच। बौंडी थाने के बौंडी फतेहउल्लापुर निवासी पेशे से राजगीर खुशुबुद्दीन खां पुत्र लियाकत की एक दर्द भरी दास्तां है। उसकी शादी वर्ष 2010 में इसी थाने के खैरटिया अमीनपुर निवासी जब्बार खां की बेटी हसरतुन के साथ इस्लामिक रिवाज से हुई थी। गुजर-बसर के लिए उसके पास चार बीघा खेत है। वर्ष 2014 में रमजान माह के दौरान गुस्से में आकर खुशुबुद्दीन ने पत्नी हसरतुन को तीन तलाक कह दिया। हालांकि बाद में वह पछताया और उलमाओं से राय ली। उसे बताया गया कि उसके द्वारा दिया गया तलाक जायज नहीं है। एक बार में दिया गया तीन तलाक मंजूर नहीं होता। नतीजतन खुशुबुद्दीन ने अपनी पत्नी हसरतुन को अपना लिया। कुछ दिन बाद हलाला का शोर मचना शुरू हुआ। उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाने लगा।

तीन तलाक के बाद हलाला न कराने पर गांव में एक वर्ग के लोगों ने पांच वर्षों से खुशुबुद्दीन को सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर रखा है। हालात यह हैं कि लोगों ने खुशुबुद्दीन के बेटे की मौत पर कब्रिस्तान में शव दफनाने के दौरान बाधा खड़ी कर दी गई। फिर नवजात बेटी की मौत होने पर अंतिम संस्कार के वक्त बिरादरी का कोई शख्स नहीं आया। उल्टे उसे हलाला की रस्म अदायगी न करने पर गांव छोड़ने की धमकी दी जा रही है। इतने विरोध के बाद भी खुशुबुद्दीन अपने इरादों पर डटा है। उसने जिलाधिकारी को शिकायती पत्र देकर कार्रवाई की मांग की है।

छह अक्टूबर 2018 को खुशुबुद्दीन के बेटे इमामुद्दीन की मौत हो गई। इस गम के समय में भी लोग हलाला को लेकर विरोध में दिखे। गांव का कोई भी शख्य बेटे के जनाजे में शरीक नहीं हुआ। यहां तक कि एक उलमा व कुछ ग्रामीणों ने शव को सुपर्दे ए खाक करने में बाधा खड़ी की। मौके पर पुलिस पहुंची तो शव को दफनाया जा सका। अभी चार माह पूर्व खुशुबुद्दीन की दो माह की बच्ची खैरून की भी सांसें थम गईं। इस मनहूस घड़ी में भी गांव का कोई भी शख्स पीड़ित परिवार के आंसू पोंछने नहीं आया। आंसुओं का सैलाब अपने अश्कों में भरे खुशुबूद्दीन ने खुद ही कब्र खोदकर बेटी के शव को दफ्न किया। अब खुशुबुद्दीन के परिवार में बेटी सायना (12), राफिया (7), राशिदा (6), आलिया (2) व बेटे सैफुद्दीन (5), अलाउद्दीन (4) है। समय के साथ ही खुशुबुद्दीन का विरोध करने वाले उलमा की संख्या बढ़कर एक से पांच हो गई है। यह हलाला कराए जाने को धमका रहे हैं।

खुशुबुद्दीन इंटर पास है। जबकि उसकी पत्नी अशिक्षित है। खुशुबुद्दीन हिन्दी ही नहीं उर्दू, अंग्रेजी, अरबी व फारसी का भी जानकार है। उसने कुछ वर्षों तक एक मदरसे में पढ़ाया भी है। हलाला को लेकर खुशुबुद्दीन के अपने महजबी तर्क हैं, जो विभिन्न महजबी किताबों से देता है। हालांकि उसके तर्कों को विरोध करने वाले सुनना नहीं चाहते।