#AMU : जलवायु परिवर्तन का सामना करना विश्व के लिए चुनौती : प्रो तारिक मंसूर

अलीगढ़ | अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग द्वारा ‘‘जलवायु परिवर्तनः सुदृढ़ कृषि एवं वातावरण’’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कांफ्रेंस का उद्घाटन समारोह कैनेडी हाल में आयोजित हुआ जिसको सम्बोधित करते हुए कुलपति प्रो. तारिक मंसूर ने कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनोती का सामना करने के लिये विश्व के विभिन्न देशों को एक सुदृढ़ कार्य योजना बनानी होगी। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से हमारी कृषि, वातावरण व्यवस्था, स्वास्थय आदि पर प्रभाव पड़ रहा है। कुलपति ने कहा कि यह विषय विवाद का भी शिकार है क्योंकि कुछ देश यह आरोप लगा रहे हैं कि जलवायु के परिवर्तन से सम्बन्धित डाटा में छेड़छाड़ की जा रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण जैव विविधता के सामने उत्पन्न होने वाले खतरे की चर्चा करते हुए प्रो. तारिक मंसूर ने कहा कि वन्य जीवन की सुरक्षा तथा धरती के नीचे जल स्तर को बरकरार रखने के तरीके हमें खोजने होंगे। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक व्यवस्था जलवायु परिवर्तन के कारण खतरे से जूझ रही है तथा कई व्यवस्थायें तो नाकारात्मक परिवर्तन तथा हानि का सामना कर चुके हैं। कृषि की जमींन को बचाने, वातावरण मित्र व्यवस्था अपनाने तथा स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता पर बल देते हुए प्रो. तारिक मंसूर ने कहा की इसमें गैर सरकारी संगठनों तथा अक्षय एवं हवाई ऊर्जा की भी मुख्य भूमिका है। उन्होंने इस सन्दर्भ में जन जागृति उत्पन्न करने पर बल देते हुए कहा कि हमें गर्व है कि अमुवि ने अक्षय ऊर्जा प्लांट लगाकर स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में देश के अन्य विश्वविद्यालयों में अग्रिणी भूमिका निभाई है। भारत सरकर के मौसम विभाग के डायरेक्टर जनरल डाॅ. केजे रमेश ने मुख्य अतिथि के रूप में अपने सम्बोधन में कहा कि 1992 में जलवायु के परिवर्तन पर यूएनओ फ्रेमवर्क कनवेंशन के बाद से विश्व के देश धरती को बचाने के तरीके खोजने के लिये निरंतर बैठकें कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में हम आधुनिक मानवीय इतिहास के सबसे नाजुक युग से गुजर रहे हैं क्योंकि वातावरण परिवर्तन के प्राथमिक प्रभाव, बड़े आर्थिक तकनीकी एवं समाजी परिवर्तनों के साथ साथ सामने आये हैं। उन्होंने कहा कि चुनोती के इस युग में कोई निर्णय न लेना बहुत गलत होगा। डाॅ. रमेश ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग को औद्योगिक क्रांति के पूर्व के 1.5 डिग्री सैलसियस तक रोकने के लक्ष्य से पीछे हट जाना एक बड़ी भूल होगी, जिसका संकल्प जलवायु परिवर्तन पर पैरिस समझोते में लगभग 200 देशों ने लिया था। कार्यक्रम के मानद् अतिथि तथा इंटरनेशनल ज्योग्राफिकल यूनियन के उपाध्यक्ष प्रो. आरबी सिंह ने कहा कि जलवायु परिवर्तन पर योजना बनाने वालों तथा शोधार्थियों के बीच बड़ी खाई है तथा आशा की जानी चाहिये कि इस कांफ्रेंस से वह खाई कम होगी। उन्होंने कहा कि कृषि जलवायु में परिवर्तन लाती है तो साथ ही साथ वह जलवायु परिवर्तन से प्रभावित भी होती है तथा हमें कृषि से होने वाले ग्रीन हाउस गैसों की निकासी को कम करना होगा तथा अनाज की पैदावार की व्यवस्था को ऐसा बनाना होगा कि वह जलवायु परिवर्तन का सामना कर सके। भूगोल विभाग के अध्यक्ष तथा कांफ्रेंस के संयोजक प्रो. अतीक अहमद ने स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि हमारे सामने अत्यधिक खतरनाक परिस्थितयाॅ हैं क्योंकि विश्व के अधिकतर भागों में फसलों के लिये आवश्यक मिट्टी, जल, गर्मी तथा सूर्य के प्रकाश पर तापमान का नाकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

उद्घाटन समारोह में 6 पुस्तकों का विमोचन किया गया जिनमें प्रो. अतीक अहमद, प्रो. एस नजमुल इस्लाम हाशमी तथा प्रो. शहाब फजल द्वारा संपादित पुस्तक ‘‘डायनामिक्स आॅफ क्लाइमेट चैन्ज’’ प्रो. अतीक अहमद, प्रो. जावर हसन खाॅन तथा प्रो. शम्सुल हक सिद्दीकी द्वारा संपादित पुस्तक ‘‘सस्टेनेबिल एग्रीकल्चर एण्ड फूड सिक्योरिटी’’, प्रो. सैयद नौशाद अहमद, प्रो. अतीक अहमद तथा प्रो. निजामउद्दीन खाॅन द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘‘सोशल एण्ड इकोनोमिक डवलपमेंटः इश्यूज़ एण्ड चैलेंजेज इन इण्डिया’’ डाॅ. निगहत बानो, प्रो. अीतक अहमद तथा डाॅ. सैयद कौसर शमीम की ‘‘इरीगेशन डायनामिक्स एण्ड एग्रीकल्चरल डवलपमेंट इन इंडिया’’, डाॅ. नई उमर की पुस्तक ‘‘रीजनल इम्पलीकेशन आॅफ ग्रीन रिव्यूलेशन’’ तथा डाॅ. निगहत बानो की ‘‘इनवायरनमेंट इम्पैक्ट असिस्मेंट एण्ड हैल्थ’’ शामिल हैं। इस अवसर पर कार्यक्रम की स्मारिका, प्रो. अतीक अहमद, प्रो. सैयद अहमद खाॅन तथा प्रो. सैयद नौशाद अहमद द्वारा सम्पादित कांफ्रेंस के शोध पत्रों तथा ‘‘द ज्योग्राफर’’ के ताजा अंक का भी विमोचन हुआ। प्रो. एस नौशाद अहमद ने कार्यक्रम का संचालन किया तथा प्रो. सईद अहमद खाॅ ने उपस्थितजनों के प्रति आभार व्यक्त किया।