अब कहां जाएं हम, तू बता ऐ ज़मीं !- पढ़िए ध्रुव गुप्त का यह आर्टिकल

अत्याधुनिक शोध बताते हैं कि हम मनुष्य पृथ्वी की मूल संतान नहीं हैं। किसी दूसरे ग्रह पर जीवन की परिस्थितियां ख़त्म होने के बाद दस लाख साल पहले परग्रही प्राणियों या एलियन ने पृथ्वी को आबाद किया था। इस हिसाब से हम एलियन हैं। शायद एक बार फिर पृथ्वी से हम मनुष्यों के विस्थापन का दौर शुरू होने वाला है। पृथ्वी की उम्र अब महज़ दो सौ से पांच सौ साल ही बची है। या तो कोई धूमकेतु आकर इससे टकराएगा या जल्द ही सूरज इसे निगलने वाला है। पृथ्वी के जल्द ही नष्ट होने की यह भविष्यवाणी इस बार किसी ज्योतिषी या धर्मगुरु की नहीं, आधुनिक युग के महान वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग की है। हाकिंग के अनुसार पृथ्वी पर अब मनुष्य का कोई भविष्य नहीं है। अगर मनुष्य को एक और दस लाख साल जीवित बचे रहना है तो उसे पृथ्वी को छोड़कर किसी और ग्रह पर शरण लेनी होगी। हाकिंग्स की चेतावनी को हल्के में लेने की भूल नहीं की जा सकती। तो फिर हमारा भविष्य कहां है ? फिलहाल भागने के हमारे पास अभी दो ही विकल्प उपलब्ध हैं – चांद और मंगल। इन दोनों ग्रहों पर पानी और जीवन की अन्य परिस्थितियों का मसला अभी हल नहीं हुआ है। वहां पानी हो भी तो क्या वह पृथ्वी के अरबों मनुष्यों के लिए पर्याप्त हैं ? वहां हवा तो होगी, लेकिन क्या हवा को जीवनदायिनी बनाने वाले पेड़-पौधे भी मौजूद हैं ? सब कुछ मिल भी जायं तो यहां से अरबों मनुष्यों को ढोकर कैसे ले जाएंगे आप ? इस विस्थापन में ही हज़ारों साल लगेंगे। अब यह तो नहीं हो सकता कि दुनिया के मुट्ठी भर साधनसंपन्न लोग चांद और मंगल पर अपनी बस्तियां बसा लें और पृथ्वी के बाकी लोगों को धूमकेतु और सूरज की आग के रहमोकरम पर छोड़ दिया जाय ? वैसे भी पृथ्वी से सुन्दर कोई ग्रह ब्रह्माण्ड में होगा, इसकी कोई संभावना नहीं। जिस हरी-भरी पृथ्वी ने लाखों साल हमें पाला-पोसा, उसे बेसहारा छोड़कर कैसे चले जाएंगे हम ? मरना है तो अपनी इसी मां के साथ मरेंगे। हम और कुछ नहीं तो इसकी उम्र थोड़ी और बढ़ाने का जतन तो कर ही सकते हैं न ? इसके दामन में कुछ और फूल खिलाकर। इसके जंगल और वृक्ष इसे वापस लौटाकर। इसकी हवा में प्राण फूंककर। इसकी नदियों को निर्मल बना कर। और सबसे बड़ी बात – इसकी सभी संतानों को अपना प्यार बांटकर!