‘यह हमारा देश है, हमारा घर है, समस्याओं को हमे खुद ठीक करना है, कोई और ठीक नहीं करेगा’ : प्रियंका चोपड़ा

ग्लोबल आइकॉन प्रियंका चोपड़ा भारत ही नहीं, दुनिया भर की महिलाओं की प्रेरणा बन चुकी हैं। यूनिसेफ की वैश्विक सद्भावना राजदूत के रूप में वह कई देशों में जा-जाकर बच्चों के अधिकारों पर बात कर रही हैं। प्रियंका का मानना है कि समाज में बदलाव लाने के लिए हमें व्यक्तिगत तौर पर अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए और समाज से इन बुराइयों को जड़ से उखाड़कर फेंकना चाहिए। हमें बंद दरवाजों के अंदर नहीं, बल्कि सामने आकर बात करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि लड़कियों को प्राथमिकता दें, उन्हें खुलकर जीने दे | उन्होंने यह भी कहा कि बेटो को हम इतनी प्राथमिकता देते हैं फिर भी वृधाश्रम खुल रहे हैं क्यों ?

प्रियंका ने यहां यूनिसेफ कार्यालय में एक कार्यक्रम के दौरान कहा, मुझे लगता है कि पिछले 10 सालों में काफी बदलाव आया है, क्योंकि आज की पीढ़ी किसी से नहीं डरती है। शायद मेरी पीढ़ी के लोगों को थोड़ा डर लगता था। हमारे माता-पिता ने जिन चीजों का सामना किया, हमने उसे बदला और हमारी पीढ़ी जिन चीजों का सामना कर रही है, उन्हें आज की नई पीढ़ी बदलेगी और इसके लिए हमें उन्हें लगातार सशक्त करना होगा। मैं 10 साल से यूनिसेफ से जुड़ी हूं और 17 साल से फिल्म उद्योग में हूं। मैंने तो यहां बहुत बदलाव देखे हैं। मैंने देखा कि अब आवाम की आवाज को रोकना मुश्किल हुआ है और आवाज ही सबसे बड़ी ताकत है।”

वह आगे कहती हैं, “अगर आप यूनिसेफ का उदाहरण लें तो यह संस्था दुनिया भर में बच्चों, किशोरों को उनके अधिकार दिलाने के लिए सरकारों, प्रशासन और कानून-निर्माताओं के पास जाकर उनसे बात करती है। वह पुराने कानून में बदलाव लाने के लिए काम करती है, ताकि बच्चों की आवाज सुनी जा सके और अभी तक इस पर काफी काम हुआ है, लेकिन बहुत काम बाकी है।” बाल विवाह, दहेज प्रथा, शिक्षा या स्वच्छता जैसी तमाम समस्याओं को सुलझाने के लिए लोग नेताओं या बॉलीवुड हस्तियों की तरफ देखते हैं, जबकि कई समस्याएं लोग एकजुट होकर खुद भी सुलझा सकते हैं।

प्रियंका कहती हैं, “मुझसे हर कोई यह सवाल करता है कि आप क्या कर रही हैं या आप क्या करेंगी। मैं कहती हूं मैं तो कर ही रही हूं। मैं पिछले 10 सालों से इस पर काम कर रही हूं। यह केवल मेरी नहीं, बल्कि हम सबकी जिम्मेदारी है। यह हमारा देश है..हमारा घर है..यहां की समस्याओं को कोई और आकर नहीं ठीक करेगा, बल्कि हमें ही मिलकर करना होगा।” वह कहती हैं, हम एक साथ बड़ी संख्या में चीजों को बदलने के बारे में क्यों सोचते हैं। हम अपने स्तर पर छोटी-छोटी चीजों को भी बदल सकते हैं। हमारे समाज में अगर एक बच्चा भी प्रताड़ित है तो वह हमारे लिए कलंक है और इस कलंक को दूर करना हम सबकी जिम्मेदारी है।”