बहुत मुश्किल है इस दौर में अलका लांबा होना..

राजनैतिक दलों ने सियासी रूप से लड़ाई का नया रणक्षेत्र सोशल मीडिया को बनाया हुआ है | दलों के आईटी सेल उनके खिलाफ उठने वाली हर आवाज का चीरहरण करने को बेताब हैं | मुद्दे की बात करने वालों को भद्दी-भद्दी गालियां देने से लेकर उसके विषय में फेक न्यूज़ चलाना आम बात है | लॉक डाउन में भी मुद्दों की बात रखने वालों को इस आईटीसेल का सामना करना पढ़ रहा है | आजकल दिल्ली की चर्चित कांग्रेस नेत्री अलका लांबा इस गैंग के निशाने पर है | ट्विटर सहित सभी प्लेटफॉर्म पर पूर्व विधायक अलका लाम्बा आमजन के मुद्दों को बेबाकी से उठा रही हैं | महिला से लेकर मजदूर तक के प्रत्येक मुद्दे को सरकार के समक्ष रख सवाल कर रही हैं | हाँ, इस दौरान जिस तरह से एक विचारधारा विशेष के लोगों द्वारा उनका चरित्रहनन करने की कोशिश की जा रही है, उनको अभद्र भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, वह वकाई खतरनाक है |

दरअसल, कोरोना महामारी ने देश को जाम कर दिया है, लोगों की जिंदगी ठहर सी गयी है लेकिन देशभर में सियासी संग्राम का नया अखाडा सोशल मीडिया बनकर निकला है | कोरोना लॉकडाउन में मजदूरों के मुद्दे से लेकर सरकार के प्रयासों तक लोगों ने सत्ता से जमकर सवाल किये हैं | भाजपा बनाम कांग्रेस की लड़ाई आम रही है | कांग्रेस के कई नेता वैसे तो ट्विटर पर एक्टिव रहते हैं लेकिन उन सबमे भाजपा-आरएसएस से टक्कर लेने का काम अलका ने किया है | शेरनी की तरह जिस तरह से उन्होंने खुद के खिलाफ चलाई गई फेक न्यूज़ का सामना किया है और उन्हें मुंहतोड़ जवाब दिया है, वह महिला होने के नाते उन्हें अति अति प्रशंसनीय बनता है | अलका लांबा कांग्रेस के सबसे चर्चित चेहरों में से एक हैं |

लॉकडाउन के दौरान हाल ही में मजदूरों की समस्या हो, यूपी में कांग्रेस की बसों का विवाद हो या मायावती को करारा जवाब देना | दिल्ली में केजरीवाल सरकार के खिलाफ बोलने का सवाल हो या देश से जुड़े मुद्दों को उठाने का अलका लांबा खुलकर सरकार से सवाल करती हुई नजर आई हैं | सत्ता के समर्थकों ने अलका से तंग आकर उनके खिलाफ कई ट्रेंड चलाये लेकिन अलका ने उन्हें मुंह तोड़ जवाब दिया | मायावती से सवाल करने पर अलका को कथित दलित हितैषियों ने घेरने की कोशिश की लेकिन वह भी अलका के सवालों के जवाब में ऐसे फंसे कि दुम दबाकर उन्हें भागना पड़ा |

इकीसवीं सदी के भारत में जब माहिला सशक्तिकरण के लाख दावे किये जा रहे हों तब भी नारी शक्ति खुलकर मैदान में आने से बचती हो तब अलका का डटकर मनुवादियों और गाँधीवादी विचारधारा के विरोधियों को जवाब देना, उनका मुकाबला करना भारत के भविष्य की नींव को मजबूत करता है | सोशल मीडिया पर अलका लांबा जिस तरह अकेली ही इन दिनों गाँधीवादी विचारधारा की वाहक बनी हुई हैं, गाँधी -नेहरू के विचारों को संजोये हुए कांग्रेस और उसकी नीतियों को आगे बढ़ा रही हैं, यह महत्वपूर्ण है | जब अधिकांश कांग्रेसी नेता मोदी सरकार के सामने हथियार डाले हुए हैं या मौन साधे हुए हैं, तब अलका जैसी नेता का आँखों में आँखें डालकर सत्ता से सवाल करना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत देता है |

इन सबके बीच विशेष यह है कि भाजपा के आईटीसेल ने अलका लांबा के चरित्रहनन से लेकर व्यक्तिगत टिपण्णी कर हर तरह से दबाने की कोशिश की लेकिन भारत की यह नारी महिला शक्ति का प्रतिनिधित्व देते हुए गाँधीवादी विचारों के साथ संघ और भाजपा के खिलाफ चट्टान सी खड़ी है | कांग्रेस हाईकमान को भी ऐसे नेताओं को प्रमोट कर राष्ट्रीय स्तर पर लाना चाहिए और देशव्यापी अभियान का हिस्सा बनाना चाहिए | अलका जैसे नेता कांग्रेस को इसलिए भी चाहिए की राहुल -प्रियंका गाँधी जैसे नेताओं का का साथ जमीन और आंदोलन से जुड़े नेता ही दे सकते हैं | ड्रॉइंग रूम की पॉलिटिक्स से इतर अलका लांबा ने जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ माहौल तैयार किया है उसे कांग्रेस को कैश करने की जरुरत है |

अलका लांबा का कांग्रेस के प्रति निष्ठा और गाँधीवादी विचारधारा के लिए समर्पण ऐसा लगता है कि मानों प्रत्येक कांग्रेसी से और गाँधीवादी विचारधारा में यकीन रखने वाले व्यक्ति से चीख चीख कर कह रहा हो
‘मेरी हिम्मत को सराहो मेरे हमराह चलो,
मैंने एक शमां जलाई है हवाओं के खिलाफ !!

वैसे भी एकबात तो सौ आने सच है कि सत्ता के खिलाफ उठती हर आवाज को दबाने के इस दौर में बहुत मुश्किल है अलका लांबा होना..

-लेखक जियाउर्रहमान, व्यवस्था दर्पण के सम्पादक हैं और राजनैतिक विश्लेष्क हैं |