अमजद खान की पुण्यतिथि पर पढ़िए ध्रुव गुप्त का आर्टिकल- एक था गब्बर !

ध्रुव गुप्त-

कोई अभिनेता किसी एक फिल्म से भी अमरत्व हासिल कर सकता है, हिंदी सिनेमा में इसका सबसे बड़ा उदाहरण मरहूम अभिनेता अमजद खान हैं। वैसे तो अमजद ने दर्जनों फिल्मों में खलनायक, सहनायक, चरित्र अभिनेता की विविध भूमिकाएं की, लेकिन याद उन्हें उनकी पहली फिल्म ‘शोले’ में गब्बर सिंह की भूमिका के लिए ही किया जाता है।

हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने किसी डाकू का इतना खूंखार, भयावह और नृशंस चरित्र न पहले देखा था और न उसके बाद कभी देख पाए। एक ऐसा चरित्र जिसकी हर हरकत अपने समय का मिथक बनी। एक ऐसी संवाद-शैली जो देखने-सुनने वालों की सांसें रोक दे। एक ऐसी मुस्कान जो रोंगटें खड़ी कर दे। एक ऐसी सधी चाल जिसके साथ धडकनें चल पड़े।

गब्बर की यह भूमिका अपने दौर के स्टार खलनायक डैनी के लिए लिखी गई थी, लेकिन डैनी के इनकार के बाद संयोग से यह नए अभिनेता अमज़द के हाथ लग गई। गब्बर की भूमिका भले ही अमज़द के लिए नहीं लिखी गई हो, लेकिन अमज़द शायद गब्बर बनने के लिए ही पैदा हुए थे। यह भूमिका उनकी अभिनय-यात्रा का ऐसा शिखर था जिसे वे खुद दुबारा नहीं छू पाए।

वे प्राण के बाद दूसरे ऐसे खलनायक हैं जिनसे लोग डरते भी बहुत हैं और प्यार भी बहुत करते हैं। गब्बर की अपनी भूमिका में अमजद खलनायिकी का एक ऐसा कीर्तिमान बनाकर गए हैं कि पचास-पचास साल बाद भी जब कोई खलनायक सिनेमा के परदे पर बड़ी-बड़ी डींगें हांकेगा तो लोग कहेंगे कि ज्यादा मत उड़ बेटे, वरना गब्बर आ जाएगा ! आज पुण्यतिथि पर खेराज-ए-अक़ीदत !

-लेखक ध्रुव गुप्त पूर्व आईपीएस और वरिष्ठ साहित्यकार हैं |