अटल की पुण्यतिथि पर पढ़िए ध्रुव गुप्त का आर्टिकल- गीत नहीं गाता हूं !

जनसंघ और भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति में अटल बिहारी बाजपेयी हिंदुत्व के एकमात्र उदार और समावेशी नेता थे जिनके मन में सभी धर्मों के प्रति आदर भी था और सबको साथ लेकर चलने की काबिलियत भी। लोगों ने उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुखौटा भी कहा और एक गलत विचारधारा के जुड़ा सही राजनेता भी, लेकिन यह भी सही है कि अपने दल में वे ऐसे एकमात्र शख्सियत थे जो संघ की विचारधारा की उपज होनेके बावजूद उससे इतर…

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घाटे का सौदा नहीं करतीं मायावती, 370 हटाने के समर्थन के पीछे ये हैं बड़े कारण-

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने काफी सोच−समझकर धारा 370 के खिलाफ मतदान किया है। ऐसा करते समय उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि उनके इस फैसले से उनका मुस्लिम वोट बैंक खिसक सकता है। संभवतः मायावती को मुस्लिम वोटों से अधिक दलित वोट बैंक की चिंता तो रही ही होगी, इसके अलावा वह यह भी नहीं चाहती होंगी कि कोई उनके ऊपर अम्बेडकर विरोधी होने का ठप्पा लगाए। क्योंकि मायावती की पूरी सियासत संविधान निर्माता और दलितों…

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पढ़िए देश को आईना दिखाता तनवीर का यह आर्टिकल- कश्मीर वह नहीं है, जो मीडिया हमें दिखाता है !

आज कल के तनाव को देखते हुए ऐसा लगता है की मैं कश्मीर से सही समय पे निकल आया. मगर सवाल केवल मेरा नहीं है, देश के एक ऐसे भाग का है जो की भारत के सर का मुकुट है. बहुत से लोग कश्मीर को भारत का अंग नहीं मानते हैं. वह लोग ग़लतफ़हमी में हैं. कश्मीर का फैसला अक्टूबर १९४७ में ही हो गया था, जब वहां के महाराजा ने भारत के साथ संधि पे हस्त्याक्षर किये थे….

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पढ़िए समाज और नेताओं को आईना दिखता ध्रुव गुप्त का आर्टिकल : उन्नाव के आगे क्या ?

उन्नाव के बलात्कार कांड में जो होता हुआ दिख रहा है, वह अपने आधुनिक भारत का शायद सबसे नृशंस और बर्बर परिदृश्य है। एक बच्ची एक दबंग विधायक और उसके गुर्गों के हाथों बलात्कार का शिकार होती है। थाने में अपनी रपट लिखाने के लिए उसे प्रदेश के मुख्यमंत्री के आवास के आगे आत्मदाह की कोशिश करनी पड़ती है। केस दर्ज होने के बाद न्यायालय के दबाव में विधायक की गिरफ्तारी तो हो जाती है, लेकिन पीड़िता के पिता…

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इस ‘झाड़ू’ को देखा तो ऐसा लगा, जैसे मथुरा का ख्‍वाब…जैसे यमुना की आस…

कल संसद परिसर में अपनी सांसद परम आदरणीय, प्रात: स्‍मरणीय हे-मा-जी को ‘झाड़ू’ लगाते देखा। यकीन मानो…कलेजा मुंह को आ गया। मन में एक हूक से उठी, लेकिन यह सोचकर बैठ गई कि क्‍या-क्‍या न किया इश्‍क में क्‍या-क्‍या न करेंगे। बुढ़ापे का इश्‍क वाकई बहुत शिद्दत से निभाया जाता है। यदि आप ये इश्‍क-मुश्‍क या प्‍यार-मोहब्‍बत वाला ”साक्षी मिश्रा टाइप” कुछ समझ रहे हैं तो गलत समझ रहे हैं। ये साक्षी भाव वाला इश्‍क है। यहां उस राजनीति…

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ओह, ट्विंकल ! ऐसे हत्यारे या बलात्कारी दरिंदे हर धर्म और जाति में मौज़ूद हैं…

अलीगढ़ में ढाई साल की ट्विंकल का अंगभंग, हत्या और शायद बलात्कार मानवता के ख़िलाफ़ सबसे नृशंस अपराधों में एक है जिसे सुनकर पूरा देश भयाक्रांत है। इस पाशविकता के ख़िलाफ़ देश भर में आक्रोश तो है, लेकिन यह आक्रोश जिस रूप में व्यक्त हो रहा है, वह भी कुछ कम पाशविक नहीं है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग ट्विंकल का वीभत्स पोस्टमार्टम रिपोर्ट शेयर कर सभी संवेदनशील लोगों, विशेषकर हर बच्ची के मां-बाप को अवसाद से भर रहे…

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..धर्मों की आड़ में अबतक दुनिया में कितने विनाश हुए हैं !

धर्मों ने मनुष्यता को जितना दिया है उससे ज्यादा हमसे छीना ही है। दुनिया के सबसे ज्यादा नरसंहार धर्म के नाम पर ही हुए हैं। भूख, बीमारी और युद्ध से ज्यादा इंसानी जानें धर्मों ने ली हैं। आज के वैज्ञानिक युग में भी धार्मिक कट्टरता ने दुनिया को नर्क बनाया हुआ है। और यह तब है जब दुनिया का कोई भी धर्म हिंसा का समर्थन नहीं करता। सभी धर्म प्रेम, अमन, करुणा और भाईचारे की ही बात करते हैं।…

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भाजपा ने जनमत को जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद से हटकर एक सूत्र में पिरोहने का कार्य किया

देश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी का पुनः वापिसी होना और जोरदार बहुमत हाँसिल करना कोई आश्चर्यजनक नही है क्योंकि लबे समय से विपक्षी पार्टियों का प्रदर्शन सकारात्मक न होकर नकारात्मक ही रहा है। खास बात यह है किसी भी विपक्षी पार्टी का उद्देश्य जीत हाँसिल करना कम अपितु सत्तारूढ़ पार्टी को हराना रहा है। अब तक ज्यादातर पार्टिंयाँ कुछ जाति विशेष तक सीमित रही है और उन्होंने इस आधार पर सत्ता पा काबिज होने की कोशिश की…

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लोकसभा चुनाव : किसकी मुट्ठी लाख की, किसकी मुट्ठी खाक की, देशभर की निगाहें, फैसला होगा कल-

शुभम अग्रवाल/ नई दिल्ली । लोकसभा चुनाव 2019 में कौन जीता और कौन हारा इससे परदा उठेगा और फिर से एक बार इतिहास के पन्नो पर नाम अंकित हो जाएगा । लेकिन नतीजों की सुबह तक पहुंचने के लिए अभी रात से गुज़रना है। रात गहरी हो रही है और नेताओं की नींद उड़ी है ।सुबह क्या फ़ैसला आएगा ये जानने की बेचैनी से आंखों से नींद गायब है। क्योंकि जनता की माने तो “आज की रात इन्हें नींद…

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पढ़िए नेताओं को आईना दिखाता ध्रुव गुप्त का आर्टिकल- राजनीति और भाषा की मर्यादा !

देश की राजनीति में भाषा, भंगिमा और गंभीरता का गिरता स्तर गंभीर चिंता का विषय है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह सहित भाजपा के ज्यादातर छोटे-बड़े नेता भाषायी दरिद्रता, फूहड़पन और मूर्खता में सबसे आगे हैं। अपने को भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देखने वाली ममता बनर्जी और मायावती भी उनसे कुछ कम फूहड़ और अहंकारी नहीं हैं। केजरीवाल, ओवैसी, नीतीश कुमार जैसे लोगों की बातों का अहंकार खींझ पैदा करता है। राहुल गांधी, अखिलेश यादव, प्रियंका गांधी जैसे…

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