बीजेपी के राम तो विपक्ष के परशुराम ! ये है SP-BSP और कांग्रेस की रणनीति-

लखनऊ | राम मंदिर के भूमि पूजन के कार्यक्रम को भव्‍य तरीके से मना कर भारतीय जनता पार्टी ने इस बात के साफ संकेत दिए हैं कि वो फिलहाल राम मंदिर के मुद्दे को छोड़ने वाली नहीं है। दूसरी ओर राम के नाम से दूरी बनाकर रखने वाला विपक्ष परशुराम को अपना बनाने में लगा है। सूबे के मुख्‍य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पिछले दिनों उपजे घटनाक्रमों से चर्चा में आई ब्राह्मण वोटों की सियासत साधने में कूद गई है। सपा नेताओं की अगुआई वाले चिरंजीव भगवान परशुराम ट्रस्ट की ओर से लखनऊ में 108 फुट की महर्षि परशुराम की प्रतिमा लगवाई जाएगी।

सूत्रों की मानें तो समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ कुछ ब्राह्मण नेताओं की बैठक हुई है। बैठक के बाद फैसला लिया गया कि हर जिले में भगवान परशुराम की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। इसके लिए चंदा भी जुटाया जाएगा। भगवान परशुराम के साथ ही क्रांतिकारी मंगल पाण्डेय की भी प्रतिमा लगाई जाएगी। गौरतलब है कि विकास दुबे गैंग के एनकाउंटर के बाद ब्राह्मण समुदाय के एक हिस्से में नाराजगी की खबरें आई थीं। सोशल मीडिया पर भी खबरें शेयर हो रही थीं। अब यूपी में 2022 में विधानसभा चुनाव है। यानी दो साल से भी कम वक्त बचा है। ऐसे में समाजवादी पार्टी ने बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए ब्राह्मण कार्ड खेला है।

वहीं, दूसरी ओर 2007 में ब्राह्मण-दलित की सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग कर सत्‍ता में आईं बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने भी ब्राह्मण वोटों को लुभाने के लिए चुनावी दांव चल दिया है। बसपा प्रमुख मायावती ने कहा, ‘यूपी में बसपा की सरकार बनने पर ब्राह्मण समाज की आस्था के प्रतीक परशुराम और सभी जातियों, धर्मों में जन्मे महान संतों के नाम पर अस्पताल और सुविधा युक्त ठहरने के स्थानों का निर्माण किया जाएगा।‘

मायावती ने कहा कि यदि SP सरकार को परशुराम की प्रतिमा लगानी ही थी तो अपने शासन काल के दौरान ही लगा देते। बसपा किसी भी मामले में सपा की तरह कहती नहीं है कर के भी दिखाती है। बसपा की सरकार बनने पर सपा की तुलना में परशुराम जी की भव्य मूर्ति लगाई जाएगी। मायावती ने कहा कि हमारी सरकार ने सभी वर्गों के महान संतों के नाम पर अनेक जनहित योजनाएं शुरू की थीं और जिलों के नाम रखे थे, जिसे बाद में आई सपा सरकार ने जातिवादी मानसिकता और द्वेष की भावना के चलते बदल दिया था। बसपा की सरकार बनते ही इन्हें फिर से बहाल किया जाएगा।

ब्राह्मण वोटरों को लुभाने के लिए सपा और बसपा ही नहीं कांग्रेस भी लगातार प्रयास कर रही है। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जितिन प्रसाद ने अपने संरक्षण में बने संगठन ‘ब्राह्मण चेतना परिषद’ जरिए ब्राह्मणों को पार्टी से जोड़ने का अभि‍यान शुरू किया है। प्रियंका गांधी वाड्रा की अगुआई वाला कांग्रेस नेतृत्व भी संदेश में जुटा है। कांग्रेस ने ब्राह्मणों को आठ बार यूपी का सीएम बनवाया, जिनमें से तीन बार नारायण दत्त तिवारी और पांच बार अन्य नेताओं को कुर्सी दी गई। यानी यूपी के 21 मुख्यमंत्रियों में से 6 ब्राह्मण रहे हैं। इस समाज ने 23 साल तक यूपी पर राज किया, जब सीएम नहीं भी रहे तो भी मंत्री पदों पर उनकी संख्या दूसरी जातियों की तुलना में सबसे अधिक रही।

हालांकि 1989 के बाद यूपी में कोई ब्राह्मण सीएम नहीं बना। साल 2017 में जब यहां बीजेपी का पूर्ण बहुमत आया तो उनमें सीएम बनने की उम्मीद थी। लेकिन हमेशा से सत्ता पर काबिज रहे इस समाज को डिप्टी सीएम पद दिया गया। वो भी प्रोटोकॉल में तीसरे नंबर पर। बताते चले कि यूपी की राजनीति में ब्राह्मण वर्ग का लगभग 10% वोट होने का दावा किया जाता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भले ही मुस्लिम-दलित आबादी 20-20% हो लेकिन रणनीति और समझदारी से वोटिंग के मामले में ब्राह्मणों से बेहतर कोई नहीं है। ब्राह्मणों की इसी खासियत ने उन्हें हर पार्टी नेतृत्व के करीब रखा।

मंडल आंदोलन के बाद यूपी की सियासत पिछड़े, दलित और मुस्लिम केंद्रित हो गई। नतीजतन, यूपी को कोई ब्राह्मण सीएम नहीं मिल सका। ब्राह्मण एक दौर में पारंपरिक रूप से कांग्रेस के साथ था, लेकिन जैसे-जैसे कांग्रेस कमजोर हुई यह वर्ग दूसरे ठिकाने खोजने लगा। मौजूदा समय में वो बीजेपी के साथ खड़ा नजर आता है। वहीं अन्‍य दल फिर से उन्‍हें अपने पाले में लाने की जद्दोजहद कर रही है।