बेवकूफ बना रही है भाजपा, कोर्ट का निर्णय आये बिना नहीं बन सकता राममंदिर !

अब इतना तय हो गया है कि लोकसभा चुनाव के पहले अयोध्या के विवादित स्थल पर राममंदिर का निर्माण शुरू नहीं हो सकता। अब जनवरी महीने में इस विवाद से जुड़े मुकदमे की सुनवाई की रूपरेखा तय की जाएगी। इस मुकदमे में एक से ज्यादा पक्ष हैं और अनेक किस्म की सत्य और काल्पनिक उलझनें हैं, जिनके कारण इस पर सुनवाई तुरंत समाप्त नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मसले पर अविलंब सुनवाई शुरू करने की अपील अस्वीकार करने के बाद मंदिर समर्थकों की नींद हराम हो रही हैं और उनमें हताशा का भाव बढ़ता जा रहा है। और जब हताशा बढ़ती है, तो उसका शिकार विवेक हो जाता है, जिसके कारण विवेकहीन बातें शुरू हो जाती हैं।

वैसी ही एक विवेकहीन बात यह है कि कानून बनाकर या अध्यादेश लाकर केन्द्र सरकार या राज्य सरकार उस विवादित भूमि का अधिग्रहण कर सकती है और उस अधिगृहित जमीन को राम मंदिर बनाने के लिए हिन्दू संगठनों को सौंपा जा सकता है। इस तरह की मांग जोर पकड़ रही है। भारतीय जनता पार्टी के अनेक नेता इस तरह की मांग कर रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद ने तो औपचारिक रूप से इस तरह की मांग कर दी है कि राममंदिर के निर्माण को शुरू करने के लिए सरकार अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार नहीं करे, बल्कि कानून बनाकर उस भूखंड को मंदिर निर्माण के लिए तैयार संगठन को सुपुर्द कर दे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी सरकार से कानून बनाने की मांग कर चुके हैं। सच तो यह है कि मंदिर निर्माण के लिए तैयार बैठे लोगों को लग रहा था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ भी हो मंदिर बनकर रहेगा। इसके पीछे उनकी सोच यह थी कि मंदिर के पक्षधर मुकदमा हार जाने के बावजूद कानून की सहायता से वह भूखंड पा लेंगे। केन्द्र ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में भी भाजपा की सरकार है और सरकार के पास यह अधिकार होता है कि उचित मुआवजा देकर वह कोई भी भूखंड अधिकृत कर ले। अब वहां मस्जिद तो है नहीं, इसलिए उसे अधिगृहित करने में सरकार को कोई दिक्कत नहीं होगी।

लेकिन इस तरह के विचार रखने वाले यह भूल जाते हैं कि विवादित भूखंड पहले से ही तकनीकी रूप से केन्द्र सरकार द्वारा अधिगृहित संपत्ति है। यह अधिग्रहण नरसिंह राव सरकार ने 1993 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद किया था। विवादित 2 दशमलव 7 एकड़ जमीन के साथ-साथ आसपास के 66 दशमलव 7 एकड़ जमीन नरसिंह राव सरकार ने एक अध्यादेश के द्वारा अधिगृहित कर ली थी। बाद में अध्यादेश का स्थान एक अधिनियम ने ले लिया। उस अधिनियम के तहत विवादित भूमि पर दाखिल सारी याचिकाओं को भी खारिज कर दिया गया था। लेकिन भूमि अधिग्रहण के उस निर्णय को अदालत में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट को सरकार ने बताया कि अधिग्रहण यह भूमि किसी को देने के लिए नहीं किया गया है, बल्कि केन्द्र सरकार अपनी कस्टडी में उसे रखना चाहती है, ताकि उसके कारण सांप्रदायिक तनाव को नियंत्रण में रखा जा सके। केन्द्र की उस दलील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहण से संबंधित उस कानून को निरस्त नहीं किया। उसका सिर्फ एक हिस्सा, जिसमें सभी याचिकाओं को समाप्त माना गया था, उसे कोर्ट ने निरस्त कर दिया और आदेश जारी किया कि केन्द्र उस भूमि की कस्टडी अपने पास रखे और याचिकाओं का निस्तारण होने के बाद जिसकी जीत होती है, भूमि उसे सौंप दे।

यानी कानून बनने और उस पर कोर्ट के दिए गए फैसले के अनुसार वह विवादित भूखंड अभी भी अधिगृहित भूखंड है, जो केन्द्र सरकार की कस्टडी में है। उसे केन्द्र को तब तक अपनी कस्टडी में रखना है, जब तक अदालत उस पर अपना अंतिम फैसला नहीं सुना दे। उसके पहले केन्द्र को यथास्थिति बनाए रखनी है। वह किसी को वह भूखंड नहीं दे सकता और जहां तक अधिग्रहण करने के लिए अध्यादेश और अधिनियम बनाने का सवाल है, तो जो जमीन एक बार अधिगृहित हो चुकी है, उसका अधिग्रहण वही सरकार दुबारा कैसे कर सकती है?

लिहाजा केन्द्र सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। मंदिर बनाने के लिए उतावले हो रहे लोग मोदी सरकार पर दबाव बनाते हुए कह रहे हैं कि जब तीन तलाक और एससी/एसटी एक्ट पर सरकार अध्यादेश और विधेयक ला सकती है, तो फिर राममंदिर के निर्माण के लिए वैसा क्यो नहीं कर सकती। लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि तीन तलाक का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत ही उस पर अध्यादेश लाया गया है और एससी/एसटी एक्ट में पुनर्विचार याचिका तो केन्द्र ने ही कर रखी थी और सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कोई वैधानिक कार्रवाई आगे करने के लिए रोक नहीं लगा रखी है।

विवादित भूखंड को लेकर सुप्रीम कोर्ट का केन्द्र सरकार को आदेश है कि वह वहां यथास्थिति बनाए रखे और वह अपने आपको उस जमीन को कस्टोडियन समझे न कि मालिक। अब जब सरकार उस जमीन की मालिक ही नहीं है, तो फिर वह उसे किसी को कैसे दे सकती है और वह भी तब, जब उस जमीन के एक से ज्यादा दावेदार मौजूद हैं और उनके दावों की जांच सुप्रीम कोर्ट कर रहा है।

यही नहीं भारतीय राज्य एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान का बेसिक स्ट्रक्चर है, इसके साथ सरकार क्या संसद भी छेड़छाड़ नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अनेक फैसले में स्पष्ट किया है कि सेक्युलर होने के कारण सरकार अपने आपको किसी धर्म विशेष से जोड़कर फैसला नहीं ले सकती। भारतीय धर्मनिरपेक्षता को कोर्ट ने पारिभाषित करते हुए कहा है कि यह सर्वधर्म समभाव पर आधारित है और सरकार को निर्णय लेते समय सर्वधर्म समभाव की भावना से ही काम करना होगा। इस भावना से विचलित होकर किया गया कोई फैसला या कानून सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया जाएगा। जाहिर है, सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे भाजपा सांसदों की कानून बनाकर मंदिर निर्माण का सपना, एक ऐसा दिवास्वप्न है, जो पूरा होता दिखाई नहीं पड़ता। इसका निर्माण तभी होगा, जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसके पक्ष में हो या विपक्ष में फैसला आने के बाद भूखंड का मालिक अपनी मर्जी से उसे मंदिर निर्माण के लिए दे दे।

– लेखक उपेन्द्र प्रसाद का आलेख साभार