क्या मन्नान को AMU से जोड़ने वाले निशांत, अच्युतानंद, संदीप और ध्रुव सक्सेना की पाठशाला पर सवाल दागेंगे ?

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक बार फिर संघी मीडिया की आंखों किरकिरी बन गई है। दरअस्ल कुछ महीने पहले अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी का पीएचडी का छात्र मन्नान वाणी आतंकी संगठन से जुड़ गया था। बीते रोज़ मन्नान वाणी को सेना द्वारा की गई एक मुठभेड़ में मार दिया गया है। दिलचस्प है कि महीनों पहले जैसे ही मन्नान वाणी के आतंकी संगठन से जुड़ने की खबर आई थी विश्विद्यालय प्रशासन ने तुरंत ही उसे विश्विद्यालय से सस्पेंड कर दिया था। लेकिन उसके बावजूद ज़ी न्यूज़ का ‘डीएनए’ एएमयू पर सवाल दाग़ रहा। टाइम्स नाऊ, रिपब्लिक सवाल दाग़ रहा है, सभी के सवाल लगभग एक जैसे हैं। सवाल किये जा रहे हैं कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी देशद्रोह की प्रयोगशाला ? एएमयू से खत्म होगा देशद्रोह का वायरस? देश के टैक्स के पैसे चलती है एएमयू, देश के खिलाफ द्रोह की प्रयोगशाला ? सवाल जायज़ हैं, कोई भी आतंकी चाहे मन्नान वाणी हो या फिर संदीप शर्मा जब भी किसी देशद्रोह जैसी गतिविधी में धरे जाऐं तो उन संस्थानों से ऐसे ही सवाल किया जाने चाहिये जहां से इन देशद्रोहियो शिक्षा हासिल की है।

लेकिन नहीं, सवाल तो सिर्फ मन्नान वाणी को पढ़ाने वाले एएमयू से ही किया जा रहा है। जिस रोज़ मन्नान वाणी को सेना ने मुठभेड़ में मारा उसी रोज़ निशांत अग्रवाल नाम का इंजीनियर पाकिस्तान के लिये जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। निशांत को सोमवार को नागपुर के वर्धा रोड केंद्र से गिरफ्तार किया गया था। उस पर भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और रूस के मिलिटरी इंडस्ट्रियल कनसोर्टियम के संयुक्त उपक्रम ब्रह्मोस ऐरोस्पेस से जुड़ी सूचनाएं लीक करने का आरोप है। इससे पहले बीएसएफ का अच्युतानंद मिश्र नाम का एक जवान आईएसआई के लिये जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उससे पहले संदीप शर्मा को इसी आरोप में गिरफ्तार किया गया, 2017 में भाजपा आई.टी. सेल का प्रभारी ध्रुव सक्सेना अपने 11 गुर्गों के साथ पाकिस्तान की खुफिया ऐजंसी आईएसआई के लिये जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किये जा चुके हैं। लेकिन ‘राष्ट्रवादी’ मीडिया के जिन संस्थानों ने मन्नान वाणी के बहाने अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी और विश्विद्यालय के संस्थापक सर सैय्यद अहमद खान पर हमले किये हैं, वे तमाम के तमाम उन गिरफ्तारियों पर खामोश रह गए जिनके नाम मन्नान के नाम से मेल नहीं खाते।

टीवी पर बहस हो रही है, ट्वीटर पर हैशटेग ट्रेंड हो रहा है, अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी पर निशाना साधा जा रहा है। लेकिन एक बार भी निशांत अग्रवाल का जिक्र नहीं किया गया, उसके स्कूल, कॉलेज, विश्विद्यालय पर सवाल करना तो दूर की बात है। टीवी पर एक मानसिकता विशेष के रिटार्यड कर्नल बैठे हैं, बड़ी बड़ी मूंछें हैं, एक दो आरएसएस के मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के ‘मुसलमान’ बैठे हैं, सभी मिलकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी पर चढ़ाई करने के लिये तैयार हैं। क्या यही लोग एक बार सिर्फ एक बार उन निशांत अग्रवाल, संदीप शर्मा, ध्रुव सक्सेना, अच्युतानंद मिश्रा की पाठशाला पर सवाल दागेंगे? क्या टीवी के चेहरे में इतनी हिम्मत है कि भारतीय जनता पार्टी से सवाल कर सके कि भारत माता की जय, और वंदेमातरम के नाम पर उत्पात काटने वाली पार्टी के आईटी सेल में आईएसआई के जासूस क्यों पाले जा रहे थे ? क्या सवाल किया जायेगा कि सेना में रहते हुए कर्नल पुरोहित हिन्दुवादी आतंकियों को हथियार क्यों सप्लाई करता था ताकि वे अजमेर,मालेगांव मक्का मस्जिद में बम फोड़कर लोगों को मार सकें ? जब इन संस्थानों से सवाल करने की हिम्मत नहीं फिर अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी ही निशाना क्यों ? क्या सिर्फ इसलिये क्योंकि विश्विद्याल के नाम में ‘मुस्लिम’ शब्द लगा हुआ है ? आप बताईये मन्नान कश्मीरी था, वह कश्मीर की ‘आजादी’ के लिये पढ़ाई छोड़कर आतंकी संगठन से जुड़ गया, मन्नान की कहानी समझ में आती है। लेकिन निशांत अग्रवाल को कौनसी आजादी चाहिये थी जो उसने देश की गद्दारी की और डीआरडीओ के राज़ पाकिस्तान को देना शुरू कर दिये ? अच्युतानंद मिश्रा तो सेना में है उसके अंदर तो देशभक्ती कूट कूट कर भरी है फिर उसने पाकिस्तान के लिये जासूसी क्यों की ? ऐसे तमाम सवाल उन लोगों के मुंह पर चिपका दीजिये जो मन्नान वाणी के बहाने अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी पर तरह तरह के आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं। और उनसे कहिये
ये है तो सबके लिये हो ये ज़िद हमारी है
इसी एक बात पर दुनिया से जंग जारी है।

-लेखक वसीम अकरम त्यागी, नेशनल स्पीक के संपादक हैं ।