..धर्मों की आड़ में अबतक दुनिया में कितने विनाश हुए हैं !

धर्मों ने मनुष्यता को जितना दिया है उससे ज्यादा हमसे छीना ही है। दुनिया के सबसे ज्यादा नरसंहार धर्म के नाम पर ही हुए हैं। भूख, बीमारी और युद्ध से ज्यादा इंसानी जानें धर्मों ने ली हैं। आज के वैज्ञानिक युग में भी धार्मिक कट्टरता ने दुनिया को नर्क बनाया हुआ है। और यह तब है जब दुनिया का कोई भी धर्म हिंसा का समर्थन नहीं करता। सभी धर्म प्रेम, अमन, करुणा और भाईचारे की ही बात करते हैं। तो चूक आख़िर कहां और कैसे हुई हमसे ?

चूक शायद हमसे यह हुई कि हममें से कोई अपना धर्म अपने होशोहवास में ख़ुद नहीं चुनता। हम सब पर यह हमारे परिवार और समाज द्वारा जबरन लादा जाता है। मैं एक हिन्दू इसीलिए हूं क्योंकि मैं एक हिन्दू मां-बाप की संतान हूं। मैं मुस्लिम, सिख, बौद्ध, यहूदी या ईसाई परिवार में भी पैदा हो सकता था।

एक मासूम बच्चे को होश संभालने के पहले किसी धर्म में दीक्षित कर देना उसके मानवाधिकारों का हनन ही नहीं, उसकी वैचारिक आज़ादी और सोच को कुंद कर देने की साज़िश भी है। और जहां जन्म लेते ही सोच और विचार को भोथरा करने की कोशिशें शुरू हो जायं, वहां संवेदना कम, कट्टरता ही ज्यादा पैदा होगी। धर्म के नाम पर दुनिया भर में दहशत फैलाने वाले लोग इसी मूर्खतापूर्ण सोच और वातावरण की उपज हैं। ईमान की बात तो यह है कि पैदा होने वाले किसी भी बच्चे को किसी धर्म का नहीं माना जाना चाहिए। स्कूलों में उसे सभी धर्मों की बुनियादी शिक्षा दी जाय। संस्कृति, नैतिकता और सामाजिकता के निर्माण में धर्मों के योगदान की जानकारी दी जाय। उसे यह भी बताया जाय कि धर्मों की आड़ में अबतक दुनिया में कितने विनाश हुए हैं। बालिग़ होने के बाद उसे अपना धर्म ख़ुद चुनने की आज़ादी हो।

और हां, आज़ादी उसे इस बात की भी हो कि वह किसी भी धर्म को नहीं चुने।

-लेखक ध्रुव गुप्त पूर्व आईपीएम हैं और ज्वलंत मुद्दों पर बेबाकी से लिखते हैं ।