महाकवि दिनकर की पुण्यतिथि पर पढ़िए ध्रुप गुप्त का आर्टिकल- अपने समय का सूर्य हूं मैं !

रामधारी सिंह दिनकर हिंदी के उन गिनेचुने कवियों में एक थे जिनकी कविताओ में एक ओर ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति का तेज है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं और प्रेम की इतनी कोमल अभिव्यक्ति जिसकी बारीकी पढ़ने वालों को स्तब्ध करती है। उनका ‘कुरुक्षेत्र’ श्रेष्ठ ओजपूर्ण काव्यों में और ‘उर्वशी’ श्रेष्ठ श्रृंगारिक काव्यों में शुमार होते हैं। दोनों काव्य रचनाएं उनके व्यक्तित्व के दो ऐसे ध्रुव है जिनके अंतर्संघर्ष की बुनियाद पर उनका विराट काव्य-संसार खड़ा है। हिदी कविता में शब्दों की असीम ताकत और नैसर्गिक प्रवाह देखना हो तो दिनकर के काव्य-संसार से बेहतर कोई जगह नहीं मिलेगी।

दिनकर की बहुआयामी प्रतिभा चकित करती है। ‘रेणुका’, ‘हुंकार’, ‘रश्मिरथी’, ‘हारे को हरिनाम’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘उर्वशी’ के कवि दिनकर एक उत्कृष्ट निबंधकार, विचारक और इतिहासकार भी थे। उनकी कुछ गद्य रचनाओं-‘मिट्टी की ओर’, अर्धनारीश्वर’, ‘रेती के फूल’, ‘वेणुवन’ और ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में भारत की संस्कृति अपनी पूरी गरिमा के साथ मुखर है। राष्ट्रकवि दिनकर की पुण्यतिथि (24 अप्रिल) पर विनम्र श्रद्धांजलि, उनके खंडकाव्य ‘उर्वशी’ के एक अंश के साथ !

मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं
उर्वशी, अपने समय का सूर्य हूँ मैं
अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूं
बादलों के सीस पर स्यंदन चलाता हूं

पर, न जानें, बात क्या है
इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है
सिंह से बांहें मिलाकर खेल सकता है
फूल के आगे वही असहाय हो जाता
शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता
विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से.

मैं तुम्हारे बाण का बींधा हुआ खग
वक्ष पर धर शीश मरना चाहता हूं
मैं तुम्हारे हाथ का लीला कमल हूं
प्राण के सर में उतरना चाहता हूं

चाहिए देवत्व,
पर, इस आग को धर दूं कहां पर
कामनाओं को विसर्जित व्योम में कर दूं कहां पर ?
वह्नि का बेचैन यह रसकोष, बोलो कौन लेगा
आग के बदले मुझे संतोष , बोलो कौन देगा ?

फिर दिशाए मौन, फिर उत्तर नहीं है !

(चित्र में हरिवंश राय बच्चन और सुमित्रानंदन पंत के साथ स्व. दिनकर)

-पूर्व आईपीएस और वरिष्ठ साहित्यकार ध्रुप गुप्त के फेसबुक वॉल से साभार