पढ़िए पूर्व IPS ध्रुव गुप्त का आर्टिकल- दीवाली : स्त्रियों की मुक्ति का पर्व !

दीवाली के पांच-दिवसीय आयोजन का आज दूसरा दिन है जिसे हम नरक चतुर्दशी या छोटी दीवाली के रूप में मनाते हैं। आज के इस उत्सव की पृष्ठभूमि में यह पौराणिक कथा है कि प्राग्ज्योतिषपुर के शक्तिशाली असुर सम्राट नरकासुर ने देवराज इन्द्र को पराजित करने के बाद देवताओं तथा ऋषियों की सोलह हजार से ज्यादा कन्याओं का अपहरण कर उन्हें अपने रनिवास में रख लिया था। नरकासुर को किसी भी देवता या पुरूष से अजेय होने का वरदान प्राप्त था। कोई स्त्री ही उसे मार सकती थी। उसके आतंक से त्रस्त देवताओं ने अंततः कृष्ण से सहायता की याचना की। देवताओं की दुर्दशा और कृष्ण की चिंता देखकर कृष्ण की एक पत्नी सत्यभामा सामने आई। कृष्ण के रनिवास की वह एकमात्र योद्धा थी जिनके पास कई युद्धों में भाग लेने का अनुभव था। उन्होंने नरकासुर से युद्ध की चुनौती स्वीकार की। कृष्ण को सारथि बनाकर वीरांगना सत्यभामा युद्ध में उतरीं और नरकासुर को पराजित कर उसे मार डाला। नरकासुर के मरने के बाद सभी सोलह हजार स्त्रियों को मुक्त करा लिया गया।

सत्यभामा और कृष्ण के द्वारका लौटने के बाद घर-घर दीये जलाकर स्त्रियों की मुक्ति का विराट उत्सव मनाया गया। नरकासुर की इसी कथा से जुड़ा कृष्ण की सोलह हजार से ज्यादा पत्नियों का मिथक भी है। जब कैद से मुक्त सोलह हजार से ज्यादा स्त्रियों को कृष्ण ने उनके घर भेजने का प्रयास किया तो या तो नरकासुर के रनिवास में लंबे समय तक रही इन औरतों को सामाजिक निंदा के भय से उनके घरवालों ने अपनाने से इंकार कर दिया या औरतें स्वयं तिरस्कार के भय से घर लौटने को तैयार नहीं हुईं। कृष्ण ने इन तिरस्कृत, बेसहारा स्त्रियों को सामाजिक सम्मान और सामान्य जीवन दिलाने के लिए उन्हें अपनी पत्नी का दर्जा दिया और उनके लिए एक अलग रनिवास बना दिया।

स्त्रियों की मुक्ति का वह उत्सव हजारों साल बाद आज भी ज़ारी है, मगर इसका अर्थ और सबक हम भूल चुके हैं। उत्सव के साथ आज का दिन हमारे लिए खुद से यह सवाल पूछने का अवसर भी है कि क्या उस घटना के हजारों साल बाद भी स्त्रियों को अपने भीतर मौजूद वासना और पुरूष-अहंकार जैसे नरकासुरों की कैद से मुक्ति दिला पाए हैं हम ?