ओह, ट्विंकल ! ऐसे हत्यारे या बलात्कारी दरिंदे हर धर्म और जाति में मौज़ूद हैं…

अलीगढ़ में ढाई साल की ट्विंकल का अंगभंग, हत्या और शायद बलात्कार मानवता के ख़िलाफ़ सबसे नृशंस अपराधों में एक है जिसे सुनकर पूरा देश भयाक्रांत है। इस पाशविकता के ख़िलाफ़ देश भर में आक्रोश तो है, लेकिन यह आक्रोश जिस रूप में व्यक्त हो रहा है, वह भी कुछ कम पाशविक नहीं है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग ट्विंकल का वीभत्स पोस्टमार्टम रिपोर्ट शेयर कर सभी संवेदनशील लोगों, विशेषकर हर बच्ची के मां-बाप को अवसाद से भर रहे हैं तो कुछ अभियुक्तों का धर्म देखकर इस घटना को सांप्रदायिक रूप देने की कोशिशों में लगे हैं। ऐसे हत्यारे या बलात्कारी दरिंदे हर धर्म और जाति में मौज़ूद हैं। हमारी चिंता का विषय यह होना चाहिए कि हमारी बच्चियों के साथ होने वाली दरिंदगी में जिस रफ़्तार से वृद्धि हो रही है, उसे रोक पाने में हमारी पुलिस और न्यायालय इस क़दर असहाय क्यों हैं ? वह भी तब जब ऐसे अपराध के लिए कानून में फांसी तक की सज़ा का प्रावधान है। क्या ऐसे अपराधों के लिए हर जिले और मेट्रो शहर में एक अलग इंवेस्टिगेटिंग टीम और अलग न्यायालय बनाकर महीने-दो महीने में अपराधियों को सज़ा सुनिश्चित नहीं जा सकती ? कब तक ये हैवान कानून को लागू और व्याख्या करने वाली संस्थाओं की लापरवाही औऱ संवेदनहीनता का फ़ायदा उठा कर इस देश को आतंक से भरते रहेंगे ?

बलात्कारी और हत्यारे सोशल मीडिया पर हमारी आपकी टिप्पणियां नहीं पढ़ते। हमारे गुस्से से डरकर उन्हें कोई सरेआम फांसी पर लटकाने भी नहीं जा रहा। जो भी होगा, कानून से ही होगा। हम कुछ कर सकते हैं तो ऐसा करें कि अपने-अपने सांसद को अपने इलाके में घेरकर सरकार को मजबूर कर दें कि वह ऐसे कांडों के अनुसंधान से लेकर सज़ा तक के लिए ज्यादा से ज्यादा तीन माह की अवधि निर्धारित करने का कानून सख़्ती से लागू करे ! हैवानों को जल्दी-जल्दी और थोक के भाव से फांसी या आजीवन कारावास की सज़ा होने लगेगी तभी उनमें दहशत फैलेगी और तभी आतंक का यह माहौल बदलेगा। अगर हम यह नहीं कर सकते तो सोशल मीडिया में अपने नपुंसक गुस्से का इज़हार करते और कविताएं लिखते हुए अपनी-अपनी बच्चियों की बारी का इंतज़ार करें ! #JusticeForTwinkle

-लेखक ध्रुव गुप्त पूर्व आईपीएस हैं ।