आगरा में जिंदा जलाई गई बेटी दलित न होती तो मीडिया और हिन्दूवादियों के लिए सुर्खियां होती !

डिजिटल होती दुनिया के दौर में हिंदुस्तान में अभी भी जाति और धर्म पर बहस राजनैतिक एवं सामाजिक रूप से हावी है। लोकसभा के चुनाव हों या विधानसभा के देश मे सरकारे रोजगार, विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दे पर न बनकर धर्म और जाति पर बन रही हैं । विशेष बात यह है कि अब भगवान की जाति बताने का दौर भी भारत मे शुरू हो गया है । विश्व जहां नए नए अविष्कार कर रहा है, वहीँ देश के नेता भगवानों की जातियां ढूंढने में व्यस्त हैं । कोई भगवान हनुमान की जाति दलित बता रहा है, कोई ब्राह्मण , कोई यादव तो कोई क्षत्रिय , कोई जाट । इतना ही नही भाजपा के एक एमएलसी ने तो हनुमान जी को मुसलमान बता दिया । खैर, नेता हैं , नेताओं का क्या । जनता जो सुनना चाहेगी सुनाएंगे लेकिन यदि उन्ही नेताओं के मुंह से दलित की मासूम बेटी को जिंदा जला देने पर एक शब्द भी न निकले तो चौंकिए मत । इन सब हालातों कब जिम्मेदार हम ही हैं ।

गत दिनों विश्व मे ताजमहल के लिए विख्यात आगरा में एक मासूम लडक़ी को रामराज का दावा करने वाली योगी सरकार में दरिंदो ने आग लगाकर जिंदा जला दिया । बेटियों की सुरक्षा करने वाली सरकार में अभी तक पुलिस उन दरिंदो को पकड़ना तो दूर उनका सुराग तक नही लगा पाई है । दलित की बेटी संजलि ने कई दिन तक जिंदगी और मौत से लड़ते हुए आखिरकार दम तोड़ दिया ।लेकिन संजलि की मौत ने देश के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं ।

सवाल यह भी है कि नसीरुद्दीन शाह ने देश मे बन रहे भय के माहौल पर हकीकत क्या बयां कर दी एक विचारधारा विशेष के लोगों के हंगामा खड़ा कर दिया लेकिन आगरा में दलित की बेटी को कथित रामराज में जिंदा जलाने पर कोई प्रतिक्रिया नही दी, आखिर क्यों ? कोई नसीरुद्दीन शाह को पाकिस्तान भेज रहा है तो कोई उन्हें गद्दार कह रहा है लेकिन वास्तविकता पर कोई चर्चा करने तक को तैयार नही है । मीडिया भी नसीरुद्दीन शाह के बयान पर डिबेट करवा रहा है । वही मीडिया आगरा के मासूम को जिंदा जलाने की खबर को दबाए हुए है । न कोई प्राइम टाइम डिबेट है और न कोई स्टोरी । आखिर क्यों ?

क्या मीडिया सिर्फ साम्प्रदायिक स्टोरी चलाना पसंद करता है या फिर घटनाओं में भी धर्म और जाति ढूंढता है ? क्या आगरा में जिंदा जलाई गई बेटी दलित है इसलिए मीडिया की सुर्खियां न बन पाई ? क्यों दलित की बेटी को भाजपा की सरकार में जिंदा जलाने पर एक भी हिंदूवादी संगठन ने विरोध नही किया ? क्यों देशभर में कथित राष्ट्रभक्तों ने आंदलोन और सभाएं नही की ?

सवाल तो अनगिनत हैं लेकिन जवाब देने वाले खामोश हैं । मीडिया सत्ता की चाटूकारिता में व्यस्त है, नफरत का जहर फैलाने में मग्न है और सरकार सत्ता के नशे में मदमस्त है । देश के हालात दिनप्रतिदिन बिगड़ते जा रहे हैं । धर्म और जाति हर जगह हावी हो रही है । नेता उलूल जुलूल बाते करने में व्यस्त हैं और आम आदमी आजाद होते हुए भी खुद को कैद से समझे हुए है । भविष्य में हालात किस तरह के होंगे यह आप कल्पना कर सकते हैं । खुदा खैर करे…

लेखक जियाउर्रहमान, व्यवस्था दर्पण के संपादक हैं ।