#स्वतंत्रता दिवस विशेष : अंग्रेजों को पहली बार #लखनऊ में मिली थी शिकस्त

30 जून 1857 को चिनहट की कठौता झील के आसपास मौजूद आजादी के दीवाने देशभक्त रणबांकुरों ने फिरंगी हुकूमत की सेना को ऐसा सबक सिखाया कि उसके पैर उखड़ गए और उन्होंने भागने में ही अपनी भलाई समझी। इस अविस्मरणीय युद्ध का प्रतीक बने कांशीराम पर्यटन प्रबंध संस्थान में स्थित शहीद स्मारक आज भी भारतीय क्रांति के योद्धाओं की गाथा बयां कर रहा हे।
1857 राष्ट्रवादी मंच के संयोजक अमरेश मिश्र बताते हैं कि अवध में खुले मैदान में अंग्रेजों की सेना को पहली बार भारतीय सेना ने हराया था। चिनहट युद्ध में बड़ी संख्या में भारत मां के सपूत शहीद हुए थे। 175 भारतीय क्रांतिकारी रणबाकुरे और अंग्रेजी सेना के 118 सिपाही मारे गए थे। 29 मार्च 1857 को बंगाल के बैरकपुर में क्रांतिकारी मंगल पाण्डेय ने पहली गोली चलाई थी। उन्हें आठ अप्रैल 1857 को फांसी हुई। इससे अवध की फौज में शामिल भारतीयों में काफी गुस्सा था।

10 मई 1857 को मेरठ में विद्रोह हुआ। 11 मई 1857 को बहादुर शाह जफर को फिर से भारत का सम्राट घोषित कर अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का आंदोलन शुरू हुआ। अवध में विद्रोह की योजना बनाई गई। लखनऊ उस समय अंग्रेजों के हाथ में था। अंग्रेज मुखिया हैनरी लारेंस लखनऊ में था। उसकी ब्रिटिश रेजीमेंट थी, जिसका नाम था 32 फुट। उसमें ब्रिटिश सैनिक थे। इस वजह से लखनऊ में क्रांतियां सफल नहीं हो पा रही थीं। फिर 30 जून को फैजाबाद क्रांतिकारियों ने सेना इकट्ठा की और लखनऊ की ओर कूच किया। लखनऊ में जब ब्रिटिश सेना को खबर मिली तो वे भी फैजाबाद की ओर आगे बढ़े। 30 जून 1857 को चिनहट और इस्माइलगंज गांव के आसपास दोनों सेनाएं आमने-सामने भिड़ीं। इसमें पहली बार भारतीय फौज को जीत मिली। इसमें क्रांतिकारी बरकत अहमद, 22 बंगाल नेटिव इंफेंट्री के सिपाही, वाजिद अली शाह के सैनिक थे, कुछ सैनिक अवध इररेगुलर इंफेंट्री के लोग भी थे। महोना के और अयोध्या के तालुकेदारों की छोटी-छोटी टुकड़ियां थीं।

आज भी गवाह बना है शिलापट–
आजादी की इस लड़ाई में बरगंवा पोस्ट इंटौरा के शिवाधार पुत्र चंदी प्रसाद व सैरपुर पूरबगांव के दयाशंकर पुत्र महावीर ने अपनी प्राण न्यौछावर कर दिए। भारत सरकार ने स्वतंत्रता की रजत जयंती वर्ष 1973 में कठौता झील पर इन शहीदों की स्मृति में एक शिलापट की स्थापना करवाई। इसमें आजादी के दोनों मतवालों के नाम मौजूद हैं।